आदर्श-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

आदर्श-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

आदर्श

यद्यपि कृपण कि अपव्ययी ही हैं धनी मानी यहाँ,
सत्कार्य में सर्वस्व के भी किन्तु हैं दानी यहाँ।
देशी नरेशों की दशा यद्यपि अभी बदली नहीं,
पर सर सयाजीराव-सम आदर्श नृप भी हैं यहीं ॥१२३॥

यद्यपि समय के फेर ने वे दिव्य गुण छोड़े नहीं,
हैं किन्तु अब भी देश में आदर्श कुछ थोड़े नहीं।
यदि जन्म लेते थे महात्मा भीष्म-तुल्य कभी यहाँ,
तो जन्मते हैं कुछ दृढ़व्रत लोकमान्य अभी यहाँ ॥१२४॥

श्री राममोहनराय, स्वामी दयानन्द सरस्वती,
उत्पन्न करती है अभी यह मेदिनी ऐसे व्रती !
साफल्य पूर्वक हैं जिन्होंने स्वमत-संस्थाएँ रची,
है धूम सारे देश में जिनके विचारों से मची ॥१२५॥

श्रीरामकृष्णोपम महात्मा, रामतीर्थोपम यती,
ऐसे जनों से आज भी यह भूमि बनती वसुमती।
द्विजवर्य ईश्वरचन्द्र-सम होते दयासागर यहीं,
देवेन्द्रनाथ-समान ऋषि अन्यत्र मिल सकते नहीं ॥१२६॥

राजेन्द्रलाल समान विद्वद्रत्न होते हैं यहाँ,
जगदीश और प्रफुल्ल-सम विज्ञानवेत्ता हैं कहाँ ?
प्राचीन विषयज्ञान में भाण्डारकर से ज्ञात हैं,
गणितज्ञ बापूदेव, बार्हस्पत्य सम विख्यात हैं ॥१२७॥

नीतिज्ञ दिनकर और माधवराव-सम सम्मान्य हैं,
कानून के विद्वान् डाक्टर घोष-तुल्य वदान्य हैं।
श्री गोखले, गाँधी-सदृश नेता महा मतिमान हैं,
वक्ता विजय-घोषक हमारे श्री सुरेन्द्र-समान हैं ॥१२८॥

निज शक्ति भारत-भूमि ने अब भी सभी खोई नहीं,
सत्कवि रवीन्द्र-समान अब भी विश्व में कोई नहीं।
अवनीन्द्र, रविवर्म्मा-सदृश हैं चित्रकार होते यहीं,
प्रख्यात हैं श्री म्हातरे-सम मूर्तिकार सभी कहीं ॥१२९॥

गायक पलुसकर, सत्यबाला-तुल्य होते हैं अभी,
वादन-कला पर मूढ़ पशु भी भूलते सुध-बुध सभी।
खरशस्त्र-धारों पर यहाँ होता अभी तक नृत्य है,
करता विमुग्ध विदेशियों को ललित कौशल कृत्य है ॥१३०॥

दिन दिन नये आदर्श बहु विध हीनता को हर रहे,
हैं माइसोर-समान देशी राज्य उन्नति कर रहे।
सब प्रान्त मिलकर प्रेमपूर्वक योग देते हैं जहाँ,
हैं बन रही देशोपकारक सभ्य-संस्थाएँ यहाँ ॥१३१॥

प्राचीन और नवीन अपनी सब दशा आलोच्य है,
अब भी हमारी अस्ति है यद्यपि अवस्था शोच्य है ।
कर्तव्य करना चाहिए, होगी न क्या प्रभु की दया,
सुख-दुःख कुछ हो, एक-सा ही सब समय किसका गया?॥१३२॥

 

विश्वास

सौ सौं निराशाएँ रहें, विश्वास यह दृढ़ मूल है–
इस आत्म-लीला-भूमि को वह विभु न सकता भूल है ।
अनुकूल अवसर पर दयामय फिर दया दिखलायेंगे,
वे दिन यहाँ फिर आयेंगे, फिर आयेंगे, फिर आयेंगे ॥१३३॥

 

विश्राम

री लेखनी ! बस बहुत है, अब और बढ़ना व्यर्थ है,
है यह अनन्त कथा तथा तू सर्वथाअसमर्थ है ?
करती हुई शुभकामना निज वेग सविनय थाम ले,
कहती हुई “जय जानकीजीवन” तनिक विश्राम ले ॥१३४॥

 

शुभकामना

सबकी नसों में पूर्वजों का पुण्य रक्तप्रवाह हो,
गुण, शील, साहस, बल तथा सबमें भरा उत्साह हो ।
सबके हृदय में सदा समवेदना का दाह हो,
हमको तुम्हारी चाह हो, तुमको हमारी चाह हो ॥१३५॥

विद्या, कला, कौशल्य में सबका अटल अनुराग हो,
उद्योग का उन्माद हो, आलस्य-अघ का त्याग हो ।
सुख और दुख में एक-सा सब भाइयों का भाग हो,
अन्तःकरण में गूंजता राष्ट्रीयता का राग हो ॥ १३६ ॥

कठिनाइयों के मध्य अध्यवसाय का उन्मेष हो,
जीवन सरल हो, तन सबल हो, मन विमल सविशेष हो।
छूटे कदापि न सत्य-पथ निज देश हो कि विदेश हो,
अखिलेश का आदेश हो जो बस वही उद्देश हो॥१३७॥

आत्मावलम्बन ही हमारी मनुजता का मर्म हो,
षड् रिपुसमर के हित सतत चारित्र्यरूपी वर्म्म हो।
भीतर अलौकिक भाव हो, बाहर जगत का कर्म्म हो,
प्रभु-भक्ति, पर-हित और निश्छल नीति ही ध्रुव धर्म्म हो॥१३८॥

उपलक्ष के पीछे कभी विगलत न जीवन-लक्ष हो,
जब तक रहें ये प्राण तन में पुण्य का ही पक्ष हो।
कर्तव्य एक न एक पावन नित्य नेत्र-समक्ष हो,
सम्पत्ति और विपत्ति में विचलित कदापि न वक्ष हो॥१३९॥

उस वेद के उपदेश का सर्वत्र ही प्रस्ताव हो,
सौहार्द और मतैक्य हो, अविरुद्ध मन का भाव हो।
सब इष्ट फल पावें परस्पर प्रेम रखकर सर्वथा,
निज यज्ञ-भाग समानता से देव लेते हैं यथा॥१४०॥

तथास्तु

 

विनय
( सोहनी )

इस देश को हे दीनबन्धो ! आप फिर अपनाइए,
भगवान् ! भारतवर्ष को फिर पुण्य-भूमि बनाइए।
जड़-तुल्य जीवन आज इसका विघ्न-बाधा-पूर्ण है,
हे रम्ब ! अब अवलम्ब देकर विघ्नहर कहलाइए ॥

हम मूक किंवा मूढ़ हों, रहते हुए तुझ शक्ति के !
माँ ब्राह्मि, कह दे ब्रह्म से सुख-शान्ति फिर सरसाइए ।
सर्वत्र बाहर और भीतर रिक्त भारत हो चुका,
फिर भाग्य इसका हे विधाता ! पूर्व-सा पलटाइए।

तू अन्नपूर्णा माँ ! रमा है और हम भूखों मरें !
कह दे जनार्दन से जगाकर दैन्य-दुःख मिटाइए ।
यह सृष्टि-गौरव-गज-ग्रसित है ग्रह-इशा के ग्राह से,
हे भक्तवत्सल ! शुभ सुदर्शन चक्र आप चलाइए॥

माँ शङ्करी ! सन्तान तेरी हाय ! यों निरुपाय हो,
श्रीकण्ठ से कह दे कि हे हर, अब न और सताइए।
शून्य श्मशान-समान भारत हाय ? कब से हो चुका,
आकर कराल विपत्ति-विष से व्योमकेश, बचाइए ॥

सम्पूर्ण गुण-गौरव-रहित हम पतित अवनत हो चुके,
अब छोड़ निर्गुणता विभो, सत्वर सगुण बन जाइए।
सीतापते ! सीतापते ! ! यह पाप-भार निहारिए, ।
अवतीर्ण होकर धर्म का निज राज्य फिर फैलाइए ॥

गोपाल ! अब वह चैन की वंशी बजेगी कब यहाँ ?
आलस्य से अभिभूत हमको कर्मयोग सिखाइए ।
जिस वसुमती पर आपने बहु ललित लीलाएँ रचीं ,
करुणानिधे ! इस काल उसको आप यों न भुलाइए॥

पशु-तुल्य परवशता मिटे प्रकटे यथार्थ मनुष्यता,
इस कूपमण्डूकत्व से परमेश, पिण्ड-छुड़ाइए।
जीवन गहन वन-सा हुआ है, भटकते हैं हम जहाँ,
प्रभुवर ! सदय होकर हमें सन्मार्ग पर पहुँचाइए॥

वह पूर्व की सम्पन्नता, यह वर्तमान विपन्नता,
अब तो प्रसन्न भविष्य की आशा यहाँ उपजाइए ।
वर मन्त्र जिसका मुक्ति था, परतन्त्र, पीड़ित है वही,
फिर वह परम पुरुषार्थ इसमें शीघ्र ही प्रकटाइए॥

यह पाप-पूर्ण परावलम्बन चूर्ण होकर दूर हो,
फिर स्वावलम्बन का हमें प्रिय पुण्य पाठ पढ़ाइए ।
“व्याकुल न हो, कुछ भय नहीं, तुम सब अमृत-सन्तान हो ।”
यह वेद की वाणी हमें फिर एक वार सुनाइए॥

यह आर्य-भूमि सचेत हो, फिर कार्य-भूमि बने अहा !
वह प्रीति-नीति बढ़े परस्पर, भीति-भाव भगाइए ।
किसके शरण होकर रहें ? अब तुम विना गति कौन है ?
हे देव वह अपनी दया फिर एक बार दिखाइए॥

शुभम्

 

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