आदमी नामा-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

आदमी नामा-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दुनिया में पादशह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़्लिसो-गदा है सो है वह भी आदमी
ज़रदार, बे-नवा है सो है वह भी आदमी
नेअमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वह भी आदमी॥1॥

अब्दाल, कुत्ब, ग़ौस, वली आदमी हुए
मुनकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरे
क्या-क्या करिश्मे कश्फ़ो-करामात के लिए
हत्ता कि अपने जुहदो-रियाज़त के ज़ोर से
ख़ालिक से जा मिला है सो है वह भी आदमी॥2॥

फ़रऔन ने किया था जो दावा खुदाई का
शद्दाद भी बिहिश्त बनाकर खुदा हुआ
नमरूद भी खुदा ही कहाता था बरमला
यह बात है समझने की आगे कहूं मैं कया
यां तक जो हो चुका है सो है वह भी आदमी॥3॥

यां आदमी ही नार है और आदमी ही नूर
यां आदमी ही पास है और आदमी ही दूर
कुल आदमी का हुस्नो-कबह में है यां ज़हूर
शैतां भी आदमी है जो करता है मक़्रो-ज़ोर
और हादी रहनुमा है सो है वह भी आदमी॥4॥

मसजिद भी आदमी ने बनायी है यां मियां
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुत्बा-ख़्वां
पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियां
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी॥5॥

यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी॥6॥

नाचे है आदमी ही बजा तालियों को यार।
और आदमी ही डाले है अपने इज़ार उतार॥
नंगा खड़ा उछलता है होकर जलीलो ख़्वार।
सब आदमी ही हंसते हैं देख उसको बार-बार॥
और वह जो मसखरा है सो है वह भी आदमी॥7॥

चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो, ले के माल
और आदमी ही मारे है फांसी गले में डाल
यां आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा भी आदमी ही निकलता है, मेरे लाल !
और झूठ का भरा है सो है वह भी आदमी॥8॥

यां आदमी ही शादी है और आदमी विवाह
काज़ी, वकील आदमी और आदमी गवाह
ताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़ामख़ाह
दोड़े है आदमी ही तो मशअल जला के राह
और ब्याहने चढ़ा है सो है वह भी आदमी॥9॥

और आदमी नक़ीब सो बोले है बार-बार
और आदमी ही प्यादे है और आदमी सवार
हुक्का, सुराही, जूतियां दौड़ें बग़ल में मार
कांधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहार
और उसमें जो पड़ा है सो है वह भी आदमी॥10॥

बैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा-लगा
और आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़्वांचा
कहता है कोई ‘लो’, कोई कहता है ‘ला, रे ला’
किस-किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना-बना
और मोल ले रहा है सो है वह भी आदमी॥11॥

यां आदमी ही क़हर से लड़ते हैं घूर-घूर।
और आदमी ही देख उन्हें भागते हैं दूर॥
चाकर, गुलाम आदमी और आदमी मजूर।
यां तक कि आदमी ही उठाते हैं जा जरूर॥
और जिसने वह फिरा है सो है वह भी आदमी॥12॥

तबले, मजीरे, दायरे सारंगियां बजा
गाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जा
रंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगा
और आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ा
जो नाच देखता है सो है वह भी आदमी॥13॥

यां आदमी ही लालो-जवाहर हैं बे-बहा
और आदमी ही ख़ाक से बदतर है हो गया
काला भी आदमी है कि उलटा है ज्यूं तवा
गोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चांद का
बदशक्ल बदनुमा है सो है वह भी आदमी॥14॥

इक आदमी हैं जिनके ये कुछ जर्क़-बर्क़ हैं
रूपे के जिनके पांव हैं सोने के फ़र्क हैं
झमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क हैं
कमख़्वाब, ताश, शाल, दुशालों में ग़र्क हैं
और चीथड़ों लगा है सो है वह भी आदमी॥15॥

एक ऐसे हैं कि जिनके बिछे हैं नए पलंग।
फूलों की सेज उनपे झमकती है ताज़ा रंग॥
सोते हैं लिपटे छाती से माशूक शोखो संग।
सौ-सौ तरह से ऐश के करते हैं रंग ढंग॥
और ख़ाक में पड़ा है सो है वह भी आदमी॥16॥

हैरां हूं यारो देखो तो यह क्या सुआंग है
यां आदमी ही चोर है और आप ही थांग है
है छीना झपटी और कहीं बांग तांग है
देखा तो आदमी ही यहां मिस्ले-रांग है
फ़ौलाद से गढ़ा है सो है वह भी आदमी॥17॥

मरने पै आदमी ही क़फ़न करते हैं तैयार।
नहला धुला उठाते हैं कांधे पै कर सवार॥
कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ार।
सब आदमी ही करते हैं, मुर्दे के कारोबार॥
और वह जो मर गया है सो है वह भी आदमी॥18॥

अशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीर
यह आदमी ही करते हैं सब कारे-दिल-पिज़ीर
यां आदमी मुरीद हैं और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ ‘नज़ीर’
और सब में जो बुरा है सो है वह भी आदमी॥19॥

 

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