आत्म-विस्मृति-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand) 

आत्म-विस्मृति-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand)

आत्म-विस्मृति

हम आज क्या से क्या हुए, भूले हुए हैं हम इसे;
है ध्यान अपने मान का हममें बताओ अब किसे?
पूर्वज हमारे कौन थे, हमको नहीं यह ज्ञान भी,
है भार उनके नाम पर दो अंजली जल-दान भी! ॥२७४।।

होकर नितान्त परावलम्बी पशु-सदृश हम जी रहे,
हा! कालकूट सभी परस्पर फूट का हैं पी रहे!
हम देखते सुनते हुए भी देखते सुनते नहीं,
पढ़ना सभी है व्यर्थ उनका जो कभी गुनते नहीं ॥२७५।।

 

मात्सर्य्य

अब एक हममें दूसरे को देख सकता है नहीं,
वैरी समझना बन्धु को भी, है समझ ऐसी यहीं!
कुत्ते परस्पर देखकर हैं दूर से ही भूंकते,
पर दूसरे को एक हम कब काटने से चूकते? ॥२७६।।

हों एक माँ के सुत कई व्यवहार सबके भिन्न हों,
सम्भव नहीं यह किन्तु जो सम्बन्ध-बन्धन छिन्न हों ।
पर यह असम्भव भी यहाँ प्रत्यक्ष सम्भव हो रहा,
राष्ट्रीय भाव-समूह मानों सर्वदा को सो रहा ! ।। २७७ ।।

 

अनुदारता

यदि एक अद्भुत बात कोई ज्ञात मुझको हो गई–
तो हाय ! मेरे साथ ही संसार से वह खो गई ।
उसको छिपा रक्खूँ न मैं तो कौन पूछेगा मुझे;
कितने प्रयोग-प्रदीप इस अनुदारता से हैं बुझे ! ।। २७८ ।।

 

गृह-कलह

इस गृह-कलह के अर्थ भारत-भूमि रणचण्डी बनी,
जीवन अशान्ति-पूर्ण सब के, दीन हो अथवा धनी !
जब यह दशा है गेह की, क्या बात बाहर की कहें ?
है कौन सहृदय जन न जिसके अब यहाँ आँसू बहें ? ।।२७९।।

उद्दंड उग्र अनैक्य ने क्षय कर दिया है क्षेम का,
विष ने पद हर लिया है आज पावन प्रेम का।
ईर्ष्या हमारे चित्त से क्षण मात्र भी हटती नहीं,
दो भाइयों में भी परस्पर अब यहाँ पटती नहीं ! ।। २८० ।।

इस गृह-कलह से ही, कि जिसकी नींव है अविचार की-
निन्दित कदाचित् है प्रथा अब सुम्मिलित परिवार की ।
पारस्परिक सौहार्द अपना अन्यथा अश्रान्त था,
हाँ, सु-“वसुधैव कुटुम्बकम”, सिद्धान्त यह एकान्त था ।।२८१।।

 

व्यभिचार

व्यभिचार ऐसा बढ़ रहा है, देख लो, चाहे जहाँ;
जैसा शहर, अनुरूप उसके एक ‘चकला’ है वहाँ ?
जाकर जहाँ हम धर्म्म खोते सदैव सहर्ष हैं,
होते पतित, कङ्गाल, रोगी सैकड़ों प्रतिवर्ष हैं ।।२८२।।

वह कौन धन है, दुर्व्यसन में हम जिसे खोते नहीं ?
उत्सव हमारे बारवधुओं के विना होते नहीं !
सर्वत्र डोंडी पिट रही है अब उन्हीं के नाम की,
मानो अधिष्ठात्री वही हैं अब यहाँ शुभ-काम की !! ॥२८३॥

था शेष लिखने के लिए क्या इस अभागे को यही ?
भगवान् ! भारतवर्ष की कैसी अधोगति हो रही है !
यदि अन्त हो जाता हमारा त्यागते ही शील के ,
तो आज टीके तो न लगते आर्य्याकुल को नील के ।।२८४।।

हा ! वे तपोधन ऋषि कहाँ, सन्तान हम उनकी कहाँ ?
थी पुण्यभूमि प्रसिद्ध जो हा ! आज ऐसा अघ वहाँ !
बस दीप से कज्जल सदृश निज पूर्वजों से हम हुए,
वे लोक में आलोक थे पर हम निविड़तर तम हुए !! ।।२८५।।

 

आडम्बर

यद्यपि उड़ा बैठे कमाई बाप-दादों की सभी,
पर ऐंठ वह अपनी भला हम छोड़ सकते हैं कभी ?
भूषण विके, ऋण मी बढे, पर धन्य सब कोई कहे;
होली जले भीतर न क्यों, बाहर दिवाली ही रहे !!! ।।२८६।।

गुण, ज्ञान, गौरव, मान, धन यद्यपि सभी कुछ खो चुके,
गजमुक्त शून्य कपित्थ-सम नि:सार अब हम हो चुके ।
पर हैं दबाते दीनता श्वेताम्बरों में भूल से !
सम्भव कभी है अग्नि को भी दाब रखना तूल से ? ।।२८७।।

दबती कहीं आडम्बरों से बहुत दिन तक दीनता ?
मिलता नहीं फिर क़र्ज़ भी, होती यहाँ तक हीनता ।
उद्योग तो हम क्या करेंगे जो अपव्यय कर रहे,
पर हाँ, हमारे हाथ से हैं दीन-दुर्बल मर रहे ।।२८८।।

अब आय तो है घट गई, पर व्यय हमारा बढ़ गया,
तिस पर विदेशी सभ्यता का भूत हम पर चढ़ गया।
ऋण-भार दिन दिन बढ़ रहा है दब रहे हैं हम यहाँ,
देता जिन्हें हो, कुछ नहीं भी पास उनके है कहाँ ? ।।२८९।।

 

मतिभ्रंश

निज पूर्वजों का हास्य करना है हमारा खेल-सा,
लगता हृदय में मेल हमको अति भयङ्कर शेल-सा ।
कोई कहे हित की उसे हमें शत्रु, समझेंगे वहीं,
मधु मय अपथ्य अभीष्ट है, कटु पथ्य हमको प्रिय नहीं ।।२९०।।

रहते गुणों से तो सदा हम लोग कोसों दूर हैं,
पर लोक में अपनी प्रशंसा चाहते भरपूर हैं !
हम तेल ढुलका कर दिये को हैं जलाना चाहते,
काटे हुए तरु में मनोहर फल फलाना चाहते ! ।।२९१।।

 

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