आत्म निवेदन-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

आत्म निवेदन-काव्यगंधा -कुण्डलिया संग्रह -त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

आत्म निवेदन

समाज, साहित्य और विज्ञान के बीच गहरा संबंध हैं। जिस समाज की दृष्टि वैज्ञानिक और साहित्य उन्नत होता है, वही समाज उपलब्धियों के नये शिखर छूता है। इसीलिए आज हमारा समाज विज्ञान को विशेष महत्व देता है। विज्ञान के अपने नियम एवं अवधारणायें हैं। उन्हीं के आधार पर उसका मूल्यांकन होता है। आज का मनुष्य हर विषय को वैज्ञानिक कसौटी पर कसकर ही स्वीकार करता है।

भारतीय संस्कृति और साहित्य का आधार प्रारम्भ से ही वैज्ञानिक रहा है। भारतीय साहित्य में वर्णित छंद अपने निश्चित शिल्प, नियम और गणितीय आधार के कारण लोकप्रिय रहे हैं।

काव्य में छंद की अपनी गरिमा और लालित्य है । छंद पाठक या श्रोता के मन में प्रसन्नता उत्पन्न करता है- ‘यः छंदयति आह्लादयति च सः छंन्दः।’

प्राचीन आचार्यों ने छंद को पद्य का पर्यायवाची माना है। जिस तरह किसी भी भाषा को सुन्दर और अलंकृत बनाने के लिये शब्द-योजना, वाक्य-योजना और शिल्प तथा शैली आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार काव्य को लययुक्त, गतिशील, गेय और प्रभावपूर्ण बनाने के लिये उसे छंद के साँचे में ढालना पड़ता है। यति, गति, तुक, गण, वर्ण अथवा मात्रा की सुनिश्चित गणना के विचार से की गयी रचना छंद कहलाती है। छंदबद्ध रचनाएँ निश्चित रूप से भावमयी और रसीली होती हैं। यह सर्वविदित है कि छांदस रचनाएँ विश्व-वाङ्मय में सदैव और सर्वत्र सम्मानित रही हैं। छंद का अपना सौन्दर्य-बोध होता है। छंद मानवीय भावनाओं को झंकृत करते हैं एवं मनभावन तो होते ही हैं।

भारतीय संस्कृति और साहित्य ने सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। भारतीय साहित्य मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण, प्रेरक और अनूठा है। प्राचीन भारतीय साहित्य छंदों में रचा गया साहित्य है। वैदिक काल से आधुनिक काल तक छंद ने साहित्य में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज की है। हिन्दी साहित्य में अनेक छंद चर्चित रहे हैं।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि भोगवादी सोच के कारण समाज में विकृतियां आती है और सामाजिक मूल्यों का ह्रास होता है। यह दुःखद है कि वर्तमान समय में मनुष्य जिस संक्रमण-काल से गुजर रहा है, उसने उसे ‘स्व’ और ‘स्वार्थ’ तक सीमित कर दिया है। यह समाज के लिए किसी भी प्रकार हितकर नहीं है। साहित्य की समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जो साहित्य सामाजिक जीवन के लिए अर्थपूर्ण होता है, वही मूल्यवान भी होता है। आत्मकेन्द्रित अथवा अत्यधिक बौद्धिकता से परिपूर्ण साहित्य जनमानस को प्रभावित ही नहीं कर पाता, तो समाज में मानवीय गुणों तथा नैतिक मूल्यों का संचार कैसे कर पायेगा।

समाज के लिए वही साहित्य ग्राह्य है, जो सहज, सरल, सरस होने के साथ-साथ व्यक्ति और समाज को दिशाबोध दे सके तथा समाज में शाश्वत और नैतिक मूल्यों की स्थापना करने में समर्थ हो। इस दृष्टिकोण से कुण्डलिया जनसामान्य का प्रिय छंद रहा है।

‘काव्यगंधा’ से समाज का किंचित मात्र भी हित होता है, तो मैं अपना श्रम सार्थक समझूँगा।
आपकी प्रतिक्रियाओं का सदैव स्वागत है ।

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

जीवन की आस्तिकता को रेखायित करते ‘कुण्डलियां छंद’

त्रिलोक सिंह ठकुरेला मूलतः एक गीतकवि हैं। मेरा उनसे परिचय कुछ वर्ष पूर्व प्रतिष्ठित वेब-पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ द्वारा संयोजित ‘नवगीत पाठशाला’ के माध्यम से हुआ। उनके द्वारा उसमें भेजी प्रविष्ठि मुझे अच्छी लगी और उस गीत की खूबियों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी मैंने उन्हें लिख भेजी। बाद में फेसबुक पर उनसे एक मित्र का रिश्ता बना और उसमें पहली बार उनकी कुण्डलियाँ अवलोकने का सुयोग मुझे मिला। मुझे लगा कि वे एक गंभीर चिंतक कवि हैं और फि़लवक्त के सरोकारों का उनकी कुण्डलियाँ काफी सटीक आकलन करती हैं। वैसे तो आज की समग्र कविता का प्रमुख सरोकार समसामयिक संदर्भों की आख्या कहना ही है, किंतु कुण्डलियों के माध्यम से उन्हें परिभाषित करने का उनका यह प्रयास मुझे बिल्कुल अछूता और अनूठा लगा। इसी बीच उनके द्वारा सम्पादित आज की पीढ़ी के कई कवियों की रची कुण्डलियों के संकलन ‘कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर’ के कुछ अंश भी फेसबुक पर मुझे पढ़ने को मिले। हिन्दी में गिरिधर कविराय की कुण्डलियों से हमारी पीढ़ी का छात्र जीवन में परिचय रहा ही था, किन्तु वह अट्ठारहवीं सदी की कहन-शैली आज के संदर्भों के लिए भी मौजूँ हो सकती है, यह भाई त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियों से परिचित होने के बाद ही मैं जान सका। गिरिधर कविराय की कुण्डलियों की भाँति ही ठकुरेला जी की कुण्डलियों में भी जीवन की आस्तिकता को रेखायित करते सार्थक संकेत निहित हैं। बतौर उद्धरण देखें उनकी यह कुण्डलिया-

‘रत्नाकर सबके लिये, होता एक समान ।
बुद्धिमान मोती चुने, सीप चुने नादान ।।
सीप चुने नादान, अज्ञ मूँगे पर मरता ।
जिसकी जैसी चाह, इकट्ठा वैसा करता ।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी खुश इच्छित पाकर ।
हैं मनुष्य के भेद, एक सा है रत्नाकर ।।

इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी की इस पुरातन रीतिकालीन काव्य विधा को एक नया आयाम देने की दृष्टि से श्री ठकुरेला का महती योगदान है। मुझे पूरी आस्था है कि उनका प्रस्तुत व्यक्तिगत कुण्डलिया संग्रह इस विरल एवं कठिन काव्य-विधा के प्रति एक बार फिर से हिन्दी के काव्य-मर्मज्ञों को आश्वत करेगा। उनके इस संग्रह के माध्यम से कुण्डलिया आज के कविता-प्रसंग को रोचक एवं समृद्ध करने में सहायक होगी, इसी विश्वास के साथ ठकुरेला जी को मेरी अनन्य शुभकामनाएँ।

-कुमार रवीन्द्र

भाव सौंदर्य एवं शिल्प सौंदर्य का अनूठा उपवन है काव्यगंधा

साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला बहुआयामी काव्य-प्रतिभा से सम्पन्न रचनाकार हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ठकुरेला जी साहित्य के क्षेत्र में कुछ न कुछ नया करते रहते हैं, उनकी यही मनोवृत्ति उन्हें अपने समकालीनों से पृथक करती है। इसी क्रम में ‘काव्यगंधा’ शीर्षक से उनका कुण्डलिया छंद संग्रह साहित्य-जगत के सामने है।

काव्यकृति ‘काव्यगंधा’ कुण्डलिया छंद के काव्य सौन्दर्य को अपने कलेवर में आत्मसात किये है। श्री ठकुरेला कुण्डलिया छंद शिल्प के पारखी हैं, प्रवीण हैं। कुण्डलिया छंद के प्रति उनके हृदय में अमित सम्मान का भाव है। इससे पूर्व उन्होंने ‘कुण्डलिया छंद’ के सात प्रमुख हस्ताक्षरों की रचनाओं को लेकर ‘कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर’ का विशिष्ट सम्पादन किया है और तत्पश्चात् ‘काव्यगंधा‘ का सृजन किया है। यह काव्यकृति उनकी मौलिक काव्य-प्रतिभा और बहुआयामी उद्भावनाओं का आकर्षक गुलदस्ता है। इसमें जीवन के विविध रंग बिखरे हैं।

‘काव्यगंधा’ भारतीय परिवेश का दर्पण है। यद्यपि अनुक्रम के अंतर्गत इसके रचनाकार ने ‘काव्यगंधा’ के कलेवर को सात भाव-शीर्षकों – ‘शाश्वत’, ‘हिन्दी’, ‘गंगा’, ‘होली’, ‘राखी’, ‘सावन’ और ‘विविध’ के अन्तर्गत विभाजित करते हुए कुण्डलिया छंद में अपनी अनुभूतियों की यथार्थ अभिव्यक्ति की है।

‘काव्यगंधा’ की प्रस्तुति में भावों की भाषागत सहजता उल्लेखनीय है। कुण्डलिया छंद जितना आकर्षक एवं मनोहारी है, वहीं भाषा की सहजता के कारण अत्यंत प्रभावी बन पड़ा है। उनकी ‘काव्यगंधा’ सहज संप्रेषणीय हो गयी है। ‘काव्यगंधा‘ में उनकी भाषा उनके भावों की अनुगामिनी बनकर आयी है। निस्संदेह वे सहज शब्द शिल्पी हैं, उनके पास प्रचुर शब्द विधान है और कहने का अपना निराला ढंग है जिसके कारण ‘काव्यगंधा‘ का शिल्प-सौन्दर्य भी उसके भाव सौन्दर्य के कारण निखर उठा है। ‘शाश्वत’ के इस छंद से मैं अपनी बात की पुष्टि करना चाहूँगा –

सोना तपता आग में और निखरता रूप।
कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप।।
छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें।
कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें।
‘ठकुरेला’ कविराय, दुखों से कभी न रोना।
निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना।।

-पृष्ठ 15

देखिए जीवन के अनुभव और परम्परागत सच्चाई को उन्होंने ‘शाश्वत’ में बड़ी कलात्मकता और जीवन्तता के साथ प्रस्तुत किया है। ‘शाश्वत’ अर्थात् जो हमेशा ही जीवन्त है, सत्य है, वही शाश्वत् है। वस्तुतः ‘शाश्वत्’ में ऐसे ही अनुभवों को प्रस्तुत करते हुए कवि ने ‘शाश्वत’ खण्ड को शाश्वत बना दिया है। इसी प्रकार हिन्दी, गंगा, होली, राखी, सावन के अन्तर्गत इन्हीं विषयों पर अपनी अनुभूतियों को उन्होंने कुण्डलिया छंद में प्रस्तुत किया है। जिनका भाव सौन्दर्य देखते ही बनता है।

‘काव्यगंधा’ में कुल 180 कुण्डलिया छंद हैं जो विविध भावों और युगीन विसंगतियों को सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। मेरा विचार तो यह है कि कवि को इसे उपशीर्षकों में निबद्ध नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कार्य तो शोधार्थी का है कि वह यह देखे कि रचनाकार ने अपनी काव्यकृति में किन-किन अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान की है। कवि तो कवि है, वह घेरे में कभी नहीं बंधता। वह जहाँ जाता है और जो देखता है, भोगता है, उसी की भाव-सुन्दरता को विविध आयामों में अभिव्यक्ति प्रदान करता है। महत्त्व उसकी दृष्टि का है, पारखी नज़रों का है। तभी तो कहा गया है, जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ जाए कवि। अतः विविध भाव-सौन्दर्य का अनूठा संगम है – ‘काव्यगंधा’ ।
भाषा के प्रति उनकी दृष्टि देखें –

भाषा में हो मधुरता, जगत करेगा प्यार।
मीठे शब्दों ने किया, सब पर ही अधिकार।।
सब पर ही अधिकार, कोकिला किसे न भाती।
सब हो जाते मुग्ध, मधुर सुर में जब गाती।
‘ठकुरेला’ कविराय, जगाती मन में आशा।
सहज बनाये काम, मंत्र है मीठी भाषा।।

-पृष्ठ 35

निःस्संदेह भाषा के प्रति उनकी यही दृष्टि और उसकी सटीक प्रस्तुति ‘काव्यगंधा’ की सफलता का सच्चा रहस्य है। ‘काव्यगंधा’ की कोई भी कुण्डलिया ले लीजिए, भाषागत सरलता और सहजता के कारण ‘काव्यगंधा’ का सौन्दर्य सहज परवान चढ़ गया है।

हिन्दी के प्रति कवि ठकुरेला के हृदय में असीम प्यार और सम्मान का भाव है-

हिन्दी को मिलता रहे, प्रभु ऐसा परिवेश।
हिन्दीमय हो एक दिन, अपना प्यारा देश।।
अपना प्यारा देश, जगत की हो यह भाषा।
मिले मान सम्मान, हर तरफ अच्छा खासा।
‘ठकुरेला’ कविराय, यही भाता है जी को।
करे असीमित प्यार, समूचा जग हिन्दी को।।

-पृष्ठ 89

कितना अथाह सम्मान का भाव है ठकुरेला जी में हिन्दी के प्रति। आज जो लोग अंग्रेजी के मोह में फंसकर राष्ट्र और राष्ट्रीयता का अपमान कर रहे हैं, उन्हें ‘काव्यगंधा’ का हिन्दी अनुक्रम दर्पण दिखाता है। ‘हिन्दी’ शीर्षक से प्रस्तुत उनकी कुण्डलिया छंद उनकी अनन्य राष्ट्र भावना के द्योतक हैं।

‘गंगा’ के अन्तर्गत भारतीय संस्कृति के विविध रूप प्रस्तुत हुए हैं। गंगा ही तो भारतीयता की पहचान है, भारत की शान है। गंगा जीवनदायिनी है, मोक्ष कारिणी है, गंगा हमारी अस्मिता है, सच्ची भारतीयता है। गंगा के प्रति कवि की अथाह श्रद्धा, आस्था, विश्वास ‘गंगा’ अनुक्रम के छंदों में अभिव्यक्त हुआ है यथा –

केवल नदिया ही नहीं, और न जल की धार।
गंगा मां है, देवि है, है जीवन आधार।।
है जीवन आधार, सभी को सुख से भरती।
जो भी आता पास, विविध विधि मंगल करती।
‘ठकुरेला’ कविराय, तारता है गंगाजल।
गंगा अमृत राशि, नहीं यह नदिया केवल।।

-पृष्ठ 92

सारतः ‘काव्यगंधा’ अनेकानेक अनुभूतियों का पावन संगम है। इसी प्रकार होली, राखी, सावन आदि शीर्षकों के अन्तर्गत कवि ने जहाँ सीधे व सच्ची प्रस्तुतियां की हैं, वहीं जीवनगत यथार्थ को भी प्रस्तुत करते हुए निरन्तर नयी प्रेरणा, नयी स्फूर्ति और नया मूल्य संस्कार देने का प्रयास कविवर ठकुरेला ने अपनी कलाकृति ‘काव्यगंधा’ में किया है।

वस्तुतः ‘काव्यगंधा’ के इन 180 कुण्डलिया छंदों में असंख्य मनोभावों, विसंगतियों, विशषताओं को उनके यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि श्री ठकुरेला ने अपनी भाषागत दक्षता एवं कुण्डलिया छंद की शिल्पगत प्रवीणता के कारण ‘काव्यगंधा’ की प्रस्तुति में चार चाँद लगा दिये हैं। निःस्संदेह वे कुण्डलिया छंद के कुशल एवं सफल शिल्पी हैं। ‘काव्यगंधा’ कुण्डलिया छंद के भाव सौन्दर्य एवं शिल्प सौन्दर्य का अनूठा उपवन है।

-डॉ. महेश ‘दिवाकर’
डी. लिट. (हिन्दी)

वही है बुद्ध
जीत लिया जिसने
जीवन युद्ध ।
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला

 

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