आत्मा के मित्र मेरे-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

आत्मा के मित्र मेरे-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

वह मित्र का मुख
ज्यों अतल आत्मा क्यारी बन गयी साक्षात् निज सुख ।
वह मधुरतम हास
जैसे आत्म-परिचय सामने ही आ रहा है मूर्त हो कर ।
जो सदा ही मम हृदय-अन्तर्गत छिपे थे
वे सभी आलोक खुलते जिस सुमुख पर !
वह हमारा मित्र है,
आत्मीयता के केन्द्र पर एकत्र सौरभ ! वह बना
मेरे हृदय का चित्र है !
जो हृदय-सागर युगों से लहरता,
आनन्द में व्याकुल चला आता
कि नीला गोल क्षण-क्षण गूंजता है,
उस जलधि की श्याम लहरों पर जुड़ा आता
सघनतम श्वेत, स्वर्गिक फेन, चंचल फेन !
जिस को नित लगाने निज मुखों पर स्वप्न की मृदु मूर्तियों-सी
अप्सराएँ सांझ-प्रात:
मृदु हवा की लहर पर से सिन्धु पर रख अरुण तलुए
उतर आतीं, कान्तिमय नव हास ले कर ।
उस जलधि की युग-युगों की अमल लहरों पर
जुड़ा जो फेन,
अन्तर के अतल हिल्लोल का जो बाह्य है सौन्दर्य-
कोमल फेन ।
जिस के आत्म-मन्दिर में समर्पित,
दु:ख-सुखों की साँझ-प्रात: जो अकेला
याद आता मुख हमें नित !
काल की, परिवर्तनों की तीव्र धारा में बहा जाता
मधुरतम साथ जिस का,
प्राण की उत्थान-गति की तीव्रता में
बह रहा उच्छ्वास जिस का,
जो हमारी प्यास में नित पास है-
व्यक्तित्व का सौरभ लिये, व्याकुल निशा-सा
निकटता के निज क्षणों में
जो कि उर की बालिका का मौनतम विश्वास है ।
जो झेलता मेरे हृदय को निज हृदय पर
आत्मउन्मुक्तीकरण की खुली बेला में कि जब
दो आत्माएं
बालकों-सी नग्न हो कर खड़ी रहतीं
दिव्य नयनों में सहजता-बोध नीलालोक ले कर !
वह परस्पर की मृदुल पहचान, जैसे पूर्ण
चन्दा खोजता हो
उमड़ती नि:सीम निस्तल
कूलहीना श्यामला जल-राशि में प्रतिबिम्ब अपना,
हास अपना,
वह परस्पर की मृदुल पहचान जैसे
अतल-गर्भा भव्य धरती हृदय के निज कूल पर
मृदु स्पर्श कर पहचान करती, गूढ़तम उस विशद
दीर्घच्छाय श्यामल-काय बरगद वृक्ष की,
जिसके तले आश्रित अनेकों पाण
जिसके मूल पृथ्वी के हृदय में टहल आये, उलझ आये :

मित्र मेरे,
आत्मा के एक !
एकाकीपने के अन्यतम प्रतिरूप ।
जिस से अधिक एकाकी हृदय ।
कमज़ोरियों के एकमेव दुलार
मित्रता में विकस ले, वह तुम अभिन्न विचार
बुद्धि की मेरी शलाका के अरुणतम नग्न जलते तेज
कर्म के चिर-वेग में उर-वेग के उन्मेष ।
पितृ-मन की स्नेह-सीमा का जहाँ है अन्त,
छल-छल मातृ-उर के क्षेम-दर्शन के परे जो लोक,
पत्नी के समर्पण-देश की गोधूलि-सन्ध्या के क्षितिज के पार,
जो विस्तृत बिछा है प्रान्त
तन्मय-तिमिर छाया है जहाँ हिल-डोल से भी दूर,
है केवल अकेला व्योम ऊपर श्याम,
नीचे तिमिरशायी अचल धरती भी अकेली एक,
तरु के तले भी केवल अकेला मौन,
जिस की दीर्घ शाखाएँ बिछीं निस्संग
जैसे लटकती है एक स्मृति-पहचान, मन के
तिमिर-कोने में त्यजित,
पत्ते भी खड़े चुपचाप सीने तान-
अपनी व्यक्तिमत्ता के सहारे जो चले हैं प्राण,
उन को कौन देता है
अचल विश्वास का वरदान !
उन को कौन देता हैं प्रखर आलोक
खुद ही जल
कि जैसे सूर्य !
अपने ही हृदय के रक्त की ऊषा
पथिक के क्षितिज पा बिछ जाय,
जिससे यह अकेला प्रान्त भी नि:सीम परिचय की मधुर
संवेदना से
आतमवत् हो जाय
ऐसी जिम मनस्वी की मनीषा,
वह हमारा मित्र है
माता-पिता-पत्नी-सुहृद् पीछे रहे हैँ छूट
उन सव के अकेले अग्र में जो चल रहा है
ज्वलत् तारक-सा,
वही तो अत्मा का मित्र है ।
मेरे हृदय का चित्र है ।

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