आत्माभिमान-भारत-भारती (अतीत खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Ateet Khand)

आत्माभिमान-भारत-भारती (अतीत खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Ateet Khand)

 

आत्माभिमान

निश्चय यवन राजत्व में ही हम पतित थे हो चुके,
बल और वैभव आदि अपना थे सभी कुछ खो चुके ।
पर यह दिखाने को कि भारत पूर्व में ऐसा न था,
आत्मावलम्बी भी हुए कुछ लोग हममें सर्वथा ।। २३७ ।।

 

महाराना प्रतापसिंह

राना प्रताप-समान तब भी शूरवीर यहाँ हुए,
स्वाधीनता के भक्त ऐसे श्रेष्ठ और कहाँ हुए ?
सुख मान कर बरसों भयङ्कर सर्व दुःखों को सहा,
पर व्रत न छोड़ा, शाह को बस तुर्क ही मुख से कहा ।।२३८।।

 

जौहर

चितौर चम्पक ही रहा यद्यपि यवन अलि हो गये,
धर्म्मार्थ हल्दीघाट में कितने सुभट बलि हो गये ।
“कुल-मान जब तक प्राण तब तक, यह नहीं तो वह नहीं,”
मेवाड़ भर में वक्तृताएँ गूंजती ऐसी रहीं !! ।। २३९ ।।

विख्यात वे जौहर1 यहाँ के अज भी हैं लोक में,
हम मग्न हैं उन पद्मिनी-सी देवियों के शोक में !
आर्य्या-स्त्रियां निज धर्म पर मरती हुईं डरती नहीं,
साद्यन्त सर्व सतीत्व-शिक्षा विश्व में मिलती यहीं !! ।।२४०।।

(1-राजपूताने में, सतीत्व धर्म की रक्षा के लिए
हज़ारों स्त्रियां जीते जी चिताओं में जल गईं ।
इसको जौहर व्रत कहते हैं ।)

 

शिवाजी

फिर भी दिखाई देश में जिसने महाराष्ट्रच्छटा-
दुर्दान्त आलमगीर का भी गर्व जिससे था घटा।
उस छत्रपति शिवराज का है नाम ही लेना अलम्,
है सिंह परिचय के लिए बस ‘सिंह’ कह देना अलम् ॥२४१॥

 

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