आत्ममुग्धा ऊषा से-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

आत्ममुग्धा ऊषा से-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

 

होकर के आत्ममुग्धा, ऊषा!
क्यों अपनी छवि बिगाड़ रही,
तुम दिन को रोक नहीं सकती
फिर क्यों सूरज को आड़ रही?

आभास हो तुम, दिन आने का
तुम नही हो सूर्य का प्रखर रूप
तुम, तम से बाहर निकली हो
तुम नही रश्मि की नरम धूप।

पश्चिम की दिशा से, ऐ ऊषा!
तुम राह कभी न पाओगी,
पूरब उत्थान, पुनीत दिशा
दिखना है तो पूरब आओगी।

क्यों श्वेत केश बादल के, ले
लोहित रंग, धूमिल कर डाला?
क्यों किरण समझ कर लाली को
पूरे आकाश को भर डाला?

सम्पूर्ण नही है कोई यहां
इस बात का मन में ध्यान रखो
मत समझो तुम हो, प्रकृति पूर्ण
नियमों को समझ अभिमान रखो।

हर कोई सीख देता है यहां
यह ईश्वर का विद्यालय है,
मानो तो पत्थर चार हैं ये
या मानो तो देवालय है।

 

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