आते थे शेर सामने-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

आते थे शेर सामने-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

आते थे शेर सामने गरदन को डाल के ।
तकते हिरन भी आज हैं आंखें निकाल के ।
नौरंग हैं तमाम ज़माने की चाल के ।
तेवर हैं बन में बदले हुए हर शगाल के ।
दरपेश अनकरीब कोई इमतेहान है ।
ख़तरे में दिख रही मुझे बच्चों की जान है ।

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