आज भी- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

आज भी- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

बदन सूरज का आज भी
मैली चादर से ढका है
आंसू ख़ून के
सुहाब कई वार रोया है
घटाएं आज भी
सरगरम-ए-सफ़र हैं उसी तरह
बच्चा आज भी बीमार पड़ा है
खपरैल के घरौंदे में
जगाता है मां को
खेंच कर बेकफ़न लाशा
बुलन्दियों से किस तरह
ग़ोताज़न है उकाब
नन्हीं चिड़ियों का शिकारी
गूंज कहकहों की आज भी
बिखरी है ईवानों में
फ़ानूस के हर शीशे में
रक्सां है बदसतूर
अक्स नौख़ेज़ कलियों का
कुंवारे बदनों का
बन्दूक से निकली सनसनाती कई वार
क्रांति, इन्कलाब, आज़ादी
वही आसमां वही ज़मीं
वही आफ़ताब वही माहताब
आज भी वैसा ही है सब कुछ
चंगेज़ हो कि हिटलर
हिन्दू हो या कि मुसलमां
इन्सान तो हर दौर में
भोला ही रहा है ठगा-सा
शातरों से जेब
कटवाता ही रहा है
आज भी
शराब तो वही है
मगर बोतलें बदल गई हैं
बीवियां तो वही हैं
हां मगर शहुर बदल गए हैं
दावा है राहबरों का
कि फासले कम हुए हैं
इनत्याज़ के, मगर
निगाह थक गई नाप कर फासले
जो बढ़ते गए हैं और भी
आख़िर सिमट आई अपने मरकज़ पर
निगाह-ए-बेताब लौट कर
अज़ल से ये सिलसिला यूं ही जारी है
मैं आज भी इसी उम्मीद पर
जिन्दा हूं
वह सुबह कभी तो आएगी आख़िर
जिसकी आगोश से फूटेगी सहर

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