आजकल कबीरदास-इन दिनों -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

आजकल कबीरदास-इन दिनों -कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

आजकल
मगहर में रहते हैं कबीरदास।

कहाँ है मगहर ?
उत्तर प्रदेश में छोटा-सा गाँव
न जाने किस समय में
ठहरी हुई ज़रा-सी जगह में
कुटिया डाल, करते अज्ञातवास
जीते एक निर्वासित जीवन
आजकल कबीरदास

यदा-कदा दिख जाते फ़क़ीरों के भेस में
कभी अनमने-से साहित्य-समाज में

सब कहते-

सह नहीं सके जब
जग की उलटबाँसी,
छोड़ दिया कासी

आजकल कम ही लौटते हैं वे
अपने मध्यकाल में,

रहते हैं त्रिकाल में।

एक दिन दिख गए मुझको
फ़िलहाल में
पूछ बैठा
फक्‍्कड़-से दिखते एक व्यक्ति से
“आप श्री दास तो नहीं,
अनन्त के रिश्तेदार ?”

अक्खड़ खड़ी बोली में बोले-
“कोई फ़र्क़ नहीं इसमें
कि मैं ‘दास’ हूँ या ‘प्रसाद’
“नाथ! हूँ या ‘दीन!
गुप्त’ हूँ या “नारायण’
या केवल एक समुदाय, हिन्दू या मुसलमान,
या मनुष्य की सामूहिक पहचान
ईश्वर-और-अल्लाह,
या केवल एक शब्द में रमण करता
पूरा ब्रह्मांड,
या सारे शब्दों से परे एक रहस्य”

स्पष्ट था कि पहचान का ही नहीं
भाषा का भी संकट था इस समय
जैसे मेरे और उनके समय को लेकर
उनका अद्वैत भाव-

“कौन कह सकता है कि जिसे
हम जी रहे आज
वह कल की मृत्यु नहीं,
और जिसे हम जी चुके कल
वह कल का भविष्य नहीं ?”

उनकी वाणी में एक राज़ था
जैसे उनकी चुप्पी में।

“अनन्त से मेरा कोई नज़दीकी रिश्ता नहीं,
वह केवल एक नाम है
जिससे मैं उसे पुकारता हूँ कभी-कभी
पर जो उसकी पहचान नहीं।
वैसे भी, रिश्तों को नाम देना
बिलकुल फ़र्ज़ी है,
होशियारी ज़रूरी है नामों को लेकर,
लोग लड़ते-मरते हैं
जिन नामों को लेकर
झूठे पड़ जाते वे देखते-देखते,
लाशों में बदल जाते
फूलों के ढेर,
करुणा और सुन्दरता का अनाम भाव
स्वाहा हो जाता है
नामों की जात-पाँत के धधकते पड़ोस में।”

एक दिन मिल गए मुझे
लोदी बाग़ के एक शानदार मक़बरे में।
ज़मीन पर पड़े एक बेताज सिकन्दर को देखकर बोले-

“नापसन्द था मुझे
सत्ता के दरबारों में सिर झुकाना।
जंज़ीरों की तरह लगते थे मुझे
दरबारी कपड़े
जिनमें अपने को जकड़े
पेश होना पड़े किसी को भी
भरे दरबार में
खुद को एक क़ैदी की तरह पकड़े,
चेहरे पर कसे मुखौटे की पाबन्दी को
उतारकर बेचेहरा होते हुए
चाहिए एक ऐसी मुक्ति
जिसमें न प्रसन्‍नता हो, न उदासी
न किसी का प्रभाव हो, न दबाव
केवल एक दार्शनिक हो अपना सद्भाव
सबके बीच लेकिन सबसे
थोड़ा हटकर भी”

देखकर अपना ज़माना
यक़ीन नहीं होता कि अब बीत गया
उनका ज़माना,
कि अब वे कहीं नहीं,
न्‌ काशी में, न मगहर में
कि अब वे केवल इसे जानने में हैं
कि वस्तुगत होकर देखना
वस्तुवत् होकर देखना है,
सही को जानना
सही हो जाना है,

उनका हर शब्द एक ज़रूरी भेद करता
दृष्टि और दृष्टि-दोष में

स्थूल की सीमाओं के षड्यन्त्र में
कौन रहता है आशंकित हर घड़ी
कि अब ज़्यादा देर नहीं उसकी हत्या में,
कि वे ही उसे मारेंगे
जिन्हें उसने बेहद प्यार दिया

वे हत्यारे नहीं
अज्ञानी हैं
जो उसे बार-बार मृत्युदंड देते
उसे सूली पर चढ़ाते
उसकी अपनी ही हत्या के जुर्म में।

कौन आश्वस्त है फिर भी
कि वह मरेगा नहीं,
मर सकती है वह दुनिया
जिस पर होते रहते अत्याचार।

आज भी यक़ीन नहीं होता
कि वह जीवनद्रोही नहीं
एक सच्चा गवाह था जीवन का
जिसने जाते-जाते कहा था-
कहाँ जाऊँगा छोड़कर
इतनी बड़ी दुनिया को
जो मेरे ही अन्दर बसी है
हज़ारों वर्षों से

यहीं रहूँगा-
इसी मिट्टी में मिलूँगा
इसी पानी में बहूँगा
इसी हवा में साँस लूँगा
इसी आग से खेलूँगा
इन्हीं क्षितिजों पर होता रहूँगा
उदय-अस्त,
इसी शून्य में दिखूँगा खोजने पर

अनर्गल वस्तुओं
और आत्मरत दुनिया से विमुख
एक निरुद्वेल में
लिखकर एक अमिट हत्ताक्षर-प्रेम
उसने एक गहरी साँस ली
और भाप बनकर छिप गया
फिर एक बार बादलों के साथ
बेहद में।

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