आगे पहुंचाते दहां तक ख़तो-पैग़ाम को दोस्त-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

आगे पहुंचाते दहां तक ख़तो-पैग़ाम को दोस्त-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

 

आगे पहुंचाते दहां तक ख़तो-पैग़ाम को दोस्त
अब तो दुनिया में रहा कोई नहीं नाम को दोस्त

दोस्त इकरंग कहां, जबकि ज़माना है दो रंग
कि वही सुबह को दुश्मन है, जो शाम को दोस्त

मेरे नज़दीक है वल्लाह, वो दुश्मन अपना
जानता जो कि है, इस काफ़िरे-ख़ुदकाम को दोस्त

दोस्ती मुझसे जो ऐ दुश्मने-आराम हुई
न मैं राहत को समझता हूं, न आराम को दोस्त

चाहता वो है बशर जिससे बढ़े इज़तो-कदर
पहले मौकूफ़ कर तू अपनी तमा-ख़ाम को दोस्त

ऐ ‘ज़फ़र’, दोस्त हैं, आग़ाज़े-मुलाकात में सब
दोस्त पर वो ही है जो शख्श हो, अंजाम को दोस्त

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