आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

आग़ोश-ए-तसव्वुर में जब मैं ने उसे मस़्का
लब-हा-ए-मुबारक से इक शोर था बस बस का

सौ बार हरीर उस का मस़्का निगह-ए-गुल से
शबनम से कब ऐ बुलबुल पैराहन-ए-गुल मस़्का

उस तन को नहीं ताक़त शबनम के तलब्बुस से
ऐ दस्त-ए-हवस इस पर तू क़स्द न कर मस का

मलती है परी आँखें और हूर जबीं सा है
है नक़्श-ए-जहाँ यारो उस पा-ए-मुक़द्दस का

तर रखियो सदा या-रब तू इस मिज़ा-ए-तर को
हम इत्र लगाते हैं गर्मी में इसी ख़स का

इस गिर्या-ए-ख़ूनीं की दौलत से नज़ीर अपने
अब कुलबा-ए-अहज़ाँ में कुल फ़र्श है अतलस का

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