आकुल अंतर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

आकुल अंतर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

 

कौन मिलनातुर नहीं है

कौन मिलनातुर नहीं है?

आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरंतर पूछती है,
कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,
और तू हो लीन मुझमें फिर बनेगा शांत?
कौन मिलनातुर नहीं है?

गगन की निर्बाध बहती बायु प्रतिपल पूछती है,
कब गिरेगी टूट तेरी देह की दीवार,
और तू हो लीन मुझमें फिर बनेगा मुक्त?
कौन मिलनातुर नहीं है?

सर्व व्यापी विश्व का व्यक्तित्व मुझसे पूछता है,
कब मिटेगा बोल तेरा अहं का अभिमान,
और तू हो लीन मुझमें फिर बनेगा पूर्ण?
कौन मिलनातुर नहीं है?

 कभी, मन, अपने को भी जाँच

कभी, मन, अपने को भी जाँच।

नियति पुस्तिका के पन्नों पर,
मूँद न आँखें, भूल दिखाकर,
लिखा हाथ से अपने तूने जो उसको भी बाँच।
कभी, मन, अपने को भी जाँच।

सोने का संसार दिखाकर,
दिया नियति ने कंकड़-पत्थर,
सही, सँजोया कंचन कहकर तूने कितना काँच?
कभी, मन, अपने को भी जाँच।

जगा नियति ने भीषण ज्वाला,
तुझको उसके भीतर डाला,
ठीक, छिपी थी तेरे दिल के अंदर कितनी आँच?
कभी, मन, अपने को भी जाँच।

यह वर्षा ॠतु की संध्या है

यह वर्षा ॠतु की संध्या है,
मैं बरामदे में कुर्सी पर
घिरा अँधेरे से बैठा हूँ
बँगले से स्विच आँफ़ सभी कर,
उठे आज परवाने इतने
कुछ प्रकाश में करना दुष्कर,
नहीं कहीं जा भी सकता हूँ
होती बूँदा-बाँदी बाहर।

उधर कोठरी है नौकर की
एक दीप उसमें बलता है,
सभी ओर से उसमें आकर
परवानों का दल जलता है,
ज्योति दिखाता ज्वाला देता
दिया पतिंगों को छलता है,
नहीं पतिंगों का दीपक के
ऊपर कोई वश चलता है।

है दिमाग़ में चक्कर करती
एक फ़ारसी की रूबाई,
शायद यह इकबाल-रचित है
किसी मित्र ने कभी सुनाई;
मेरे मनोभाव की इसके
अंदर है कुछ-कुछ परछाई।-

‘दिल दीवाना,
दिल परवाना,
तज दीपक लौ पर मँड़राना,
कब सीखेगा पाँव बढ़ाना
उस पथ पर जो है मर्दाना।
ज्वाला है खुद तेरे अंदर,
जलना उसमें सीख निरंतर,
उस ज्वाला में जल क्या पाना
जो बेगाना, जो बेगाना।’

(दिला नादानिये परवाना ताके,
नगीरी शेवए मर्दाना ताके,
यके खुद राज़ सोज़ें ख़ेसतन सोज,
तवाफ़े आतिशे बेगाना ताके।)

यह दीपक है, यह परवाना

यह दीपक है, यह परवाना।

ज्वाल जगी है, उसके आगे
जलनेवालों का जमघट है,
भूल करे मत कोई कहकर,
यह परवानों का मरघट है;
एक नहीं है दोनों मरकर जलना औ’ जलकर मर जाना।
यह दीपक है, यह परवाना।

इनकी तुलना करने को कुछ
देख न, हे मन, अपने अंदर,
वहाँ चिता चिंता की जलती,
जलता है तू शव-सा बनकर;
यहाँ प्रणय की होली में है खेल जलाना या जल जाना।
यह दीपक है, यह परवाना।

लेनी पड़े अगर ज्वाला ही
तुझको जीवन में, मेरे मन,
तो न मृतक ज्वाला में जल तू
कर सजीव में प्राण समर्पण;
चिता-दग्ध होने से बेहतर है होली में प्राण गँवाना।
यह दीपक है, यह परवाना।

वह तितली है, यह बिस्तुइया

वह तितली है, यह बिस्तुइया।

यह काली कुरूप है कितनी!
वह सुंदर सुरूप है कितनी!
गति से और भयंकर लगती यह, उसका है रूप निखरता।
वह तितली है, यह बिस्तुइया।

बिस्तुइया के मुँह में तितली,
चीख हृदय से मेरे निकली,
प्रकृति पुरी में यह अनीति क्यों, बैठा-बैठा विस्मय करता
वह तितली थी, यह बिस्तुइया।

इस अंधेर नगर के अंदर
–दोनों में ही सत्य बराबर,
बिस्तुइया की उदर-क्षुधा औ’ तितली के पर की सुंदरता।
वह तितली है, यह बिस्तुइया।

 क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त

क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त?

तेरे जीवन की क्यारी में
कुछ उगा नहीं, मैंने माना,
पर सारी दुनिया मरुथल है
बतला तूने कैसे जाना?
तेरे जीवन की सीमा तक क्या जगती का आँगन समाप्त?
क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त?

तेरे जीवन की क्यारी में
फल-फूल उगे, मैंने माना,
पर सारी दुनिया मधुवन है
बतला तूने कैसे जाना?
तेरे जीवन की सीमा तक क्या जगती का मधुवन समाप्त?
क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त?

जब तू अपने दुख में रोता,
दुनिया सुख से गा सकती है,
जब तू अपने सुख में गाता,
वह दुख से चिल्ला सकती है;
तेरे प्राणों के स्पंदन तक क्या जगती का स्पंदन समाप्त?
क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त?

कितना कुछ सह लेता यह मन

कितना कुछ सह लेता यह मन!

कितना दुख-संकट आ गिरता
अनदेखी-जानी दुनिया से,
मानव सब कुछ सह लेता है कह पिछले कर्मों का बंधन।
कितना कुछ सह लेता यह मन!

कितना दुख-संकट आ गिरता
इस देखी-जानी दुनिया से,
मानव यह कह सह लेता है दुख संकट जीवन का शिक्षण।
कितना कुछ सह लेता यह मन!

कितना दुख-संकट आ गिरता
मानव पर अपने हाथों से,
दुनिया न कहीं उपहास करे सब कुछ करता है मौन सहन।
कितना कुछ सह लेता यह मन!

हृदय सोच यह बात भर गया

हृदय सोच यह बात भर गया!

उर में चुभने वाली पीड़ा,
गीत-गंध में कितना अंतर,
कवि की आहों में था जादू काँटा बनकर फूल झर गया।
हृदय सोच यह बात भर गया!

यदि अपने दुख में चिल्लाता
गगन काँपता, धरती फटती,
एक गीत से कंठ रूँधकर मानव सब कुछ सहन कर गया।
हृदय सोच यह बात भर गया!

कुछ गीतों को लिख सकते हैं,
गा सकते हैं कुछ गीतों को,
दोनों से था वंचित जो वह जिया किस तरह और मर गया।
हृदय सोच यह बात भर गया!

 करुण अति मानव का रोदन

करुण अति मानव का रोदन।

ताज, चीन-दीवार दीर्घ जिन हाथों के उपहार,
वही सँभाल नहीं पाते हैं अपने सिर का भार!
गड़े जाते भू में लोचन!

देव-देश औ’ परी-पुरी जिन नयनों के वरदान,
जिनमें फैले, फूले, झूले कितने स्वप्न महान,
गिराते खारे लघु जल कण!

जो मस्तिष्क खोज लेता है अर्थ गुप्त से गुप्त,
स्रष्टा, सृष्टि और सर्जन का कहाँ हो गया लुप्त?
नहीं धरता है धीरज मन!
करुण अति मानव का रोदन।

अकेलेपन का बल पहचान

अकेलेपन का बल पहचान।

शब्द कहाँ जो तुझको, टोके,
हाथ कहाँ जो तुझको रोके,
राह वही है, दिशा वही, तू करे जिधर प्रस्थान।
अकेलेपन का बल पहचान।

जब तू चाहे तब मुस्काए,
जब चाहे तब अश्रु बहाए,
राग वही है तू जिसमें गाना चाहे अपना गान।
अकेलेपन का बल पहचान।

तन-मन अपना, जीवन अपना,
अपना ही जीवन का सपना,
जहाँ और जब चाहे कर दे तू सब कुछ बलिदान।
अकेलेपन का बल पहचान।

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्यों न हम लें मान,
हम हैं चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बँटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

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