आकुल अंतर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

आकुल अंतर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

 

नई यह कोई बात नहीं

नई यह कोई बात नहीं।

कल केवल मिट्टी की ढ़ेरी,
आज ‘महत्ता’ इतनी मेरी,
जगह-जगह मेरे जीवन की जाती बात कही।
नई यह कोई बात नहीं।

सत्य कहे जो झूठ बनाए,
भला-बुरा जो जी में आए,
सुनते हैं क्यों लोग–पहेली मेरे लिए रही।
नई यह कोई बात नहीं।

कवि था कविता से था नाता,
मुझको संग उसी का भाता,
किंतु भाग्य ही कुछ ऐसा है,
फेर नहीं मैं उसको पाता।
जहाँ कहीं मैं गया कहानी मेरे साथ रही।
नई यह कोई बात नहीं।

तिल में किसने ताड़ छिपाया

तिल में किसने ताड़ छिपाया?

छिपा हुआ था जो कोने में,
शंका थी जिसके होने में,
वह बादल का टुकड़ा फैला, फैल समग्र गगन में छाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

पलकों के सहसा गिरने पर
धीमे से जो बिन्दु गए झर,
मैंने कब समझा था उनके अंदर सारा सिंधु समाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

कर बैठा था जो अनजाने,
या कि करा दी थी सृष्टा ने,
उस ग़लती ने मेरे सारे जीवन का इतिहास बनाया।
तिल में किसने ताड़ छिपाया?

 कवि तू जा व्यथा यह झेल

कवि तू जा व्यथा यह झेल।

वेदना आई शरण में
गीत ले गीले नयन में,
क्या इसे निज द्वार से तू आज देगा ठेल।
कवि तू जा व्यथा यह झेल।

पोंछ इसके अश्रुकण को,
अश्रुकण-सिंचित वदन को,
यह दुखी कब चाहती है कलित क्रीड़ा-केलि।
कवि तू जा व्यथा यह झेल।

है कहीं कोई न इसका,
यह पकड़ ले हाथ जिसका,
और तू भी आज किसका,
है किसी संयोग से ही हो गया यह मेल।
कवि तू जा व्यथा यह झेल।

मुझको भी संसार मिला है

मुझको भी संसार मिला है।

जिन्हें पुतलियाँ प्रतिपल सेतीं,
जिन पर पलकें पहरा देतीं,
ऐसी मोती की लड़ियों का मुझको भी उपहार मिला है।
मुझको भी संसार मिला है।

मेरे सूनेपन के अंदर
हैं कितने मुझ-से नारी-नर!
जिन्हें सुखों ने ठुकराया है मुझको उनका प्यार मिला है।
मुझको भी संसार मिला है।

इससे सुंदर तन है किसका?
इससे सुंदर मन है किसका?
मैं कवि हूँ मुझको वाणी के तन-मन पर अधिकार मिला है।
मुझको भी संसार मिला है।

वह नभ कंपनकारी समीर

वह नभ कंपनकारी समीर,
जिसने बादल की चादर को
दो झटके में कर तार-तार,
दृढ़ गिरि श्रृंगों की शिला हिला,
डाले अनगिन तरूवर उखाड़;
होता समाप्‍त अब वह समीर
कलि की मुसकानों पर मलीन!
वह नभ कंपनकारी समीर।

वह जल प्रवाह उद्धत-अधीर,
जिसने क्षिति के वक्षस्‍थल को
निज तेज धार से दिया चीर,
कर दिए अनगिनत नगर-ग्राम-
घर बेनिशान कर मग्‍न-नीर,
होता समाप्‍त अब वह प्रवाह
तट-शिला-खंड पर क्षीण-क्षीण!
वह जल प्रवाह उद्धत-अधीर।

मेरे मानस की महा पीर,
जो चली विधाता के सिर पर
गिरने को बनकर वज्र शाप,
जो चली भस्‍म कर देने को
यह निखिल सृष्टि बन प्रलय ताप;
होती समाप्‍त अब वही पीर,
लघु-लघु गीतों में शक्तिहीन!
मेरे मानस की महा पीर।

तूने अभी नहीं दुख पाए

तूने अभी नहीं दुख पाए।

शूल चुभा, तू चिल्लाता है,
पाँव सिद्ध तब कहलाता है,
इतने शूल चुभें शूलों के चुभने का पग पता न पाए।
तूने अभी नहीं दुख पाए।

बीते सुख की याद सताती?
अभी बहुत कोमल है छाती,
दुख तो वह है जिसे सहन कर पत्थर की छाती हो जाए।
तूने अभी नहीं दुख पाए।

कंठ करुण स्वर में गाता है,
नयनों में घन घिर आता है,
पन्ना-पन्ना रंग जाता है
लेकिन, प्यारे, दुख तो वह है,
हाथ न ड़ोले, कंठ न बोले, नयन मुँदे हों या पथराए।
तूने अभी नहीं दुख पाए।

ठहरा-सा लगता है जीवन

ठहरा-सा लगता है जीवन।

एक ही तरह से घटनाएँ
नयनों के आगे आतीं हैं,
एक ही तरह के भावों को
दिल के अंदर उपजातीं हैं,
एक ही तरह से आह उठा, आँसू बरसा,
हल्का हो जाया करता मन।
ठहरा सा लगता है जीवन।

एक ही तरह की तान कान
के अंदर गूँजा करती है,
एक ही तरह की पंक्ति पृष्ठ
के ऊपर नित्य उतरती है,
एक ही तरह के गीत बना, सूने में गा,
हल्का हो जाया करता मन।
ठहरा-सा लगता है जीवन।

हाय, क्या जीवन यही था

हाय, क्या जीवन यही था।
एक बिजली की झलक में
स्वप्न औ’ रस-रूप दीखा,
हाथ फैले तो मुझे निज हाथ भी दिखता नहीं था।
हाय क्या जीवन यही था।

एक झोंके ने गगन के
तारकों में जा बिठाया,
मुट्ठियाँ खोलीं, सिवा कुछ कंकड़ों के कुछ नहीं था।
हाय क्या जीवन यही था।

मैं पुलक उठता न सुख से
दुःख से तो क्षुब्ध होता,
इस तरह निर्लिप्त होना लक्ष्य तो मेरा नहीं था।
हाय क्या जीवन यही था।

 

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