आँसू-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

आँसू-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

आँखों में उमड़ते देखा
दामन में भरते देखा।
कभी अरमान बन के बहे
दर्द की पहचान बन के बहे।

कभी पलकों पर बने रहे
बादल की तरह घने रहे।
कभी बहकर बदन भिगोया
छलककर अंदर भी खोया।
अंदर जो सूखे, नासूर बने
दर्द कुछ नये प्रचूर बने।

सुना कि आँसू गम धोते
इसलिये तो हम रोते।
आँसुओं का सैलाब नअंदर होता
बाहर फिर कैसे समन्दर होता।
अश्कों पर चमकते सिन्दूर देखा
प्रिय जन को जाते दूर देखा।

अगर ये आँसू न होते
दर्द दिल के कैसे धोते?
कुछ आँसुओं को रुमाल मिले
बहते कुछ बेहाल मिले।
कुछ आँसू पी के जिये
कुछ आँसू जी के पिये।

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