आँख का पानी-शंकर कंगाल नहीं-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

आँख का पानी-शंकर कंगाल नहीं-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

यों तुम्हारे काम ऐसे ही रहे;
पर, देश का यौवन,
नहीं निर्जीव हो पाया।
अभी भी शक्ति है उसमें,
लड़ाई क्या लड़ोगे?
मत कसो लंगोट,
मेरी बात मानो-
दम्भ छोड़ो और सत्ता का नशा भी।
अब तुम्हारी चाल,
चलने की नहीं है।
और आगे दाल,
गलने की नहीं है;
क्योंकि पानी नाम का जो तत्व,
है बेहद ज़रूरी-
वह तुम्हारी आँख में
बिल्कुल नहीं है।।

 

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