अहंकार-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

अहंकार-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

अहंकार को वश में करके
समय – समय पर झुकना सीखो।

दर्प भरे तरु खड़े धरा पर
तूफानों में गिर जाते,
अकड़न जिनकी रग में बसती
विपदा में वो घिर जाते।

झुकना जिसने सीख लिया वो
झुक फिर से उठ जाते हैं,
आँधी में भी झूम -झूम के
गीत खुशी के गाते हैं।

देख प्रभंजन झुकते तृण सब
आँधी से प्रतिकार नहीं,
जीने की है कला मिली
झुकने में इनकी हार नहीं।

अहंकार तो मौत सदृश है
भूतल पर सर कर देता,
झुकना फिर उठ जाना तो
मधु -रस से जीवन भर देता।

प्रश्न नहीं की आँधी में तृण
झुकते कितनी बार यहाँ,
प्रश्न मगर कानन के दृढ़ द्रुम
की क्यों होती हार यहाँ?

झुकने का अध्यात्म किसी को
जीवन से है भर देता,
अकड़ा जो भी इस वसुधा पर
विधिना जीवन हर लेता।

दुर्गम, कठिन, कंटीले पथ पर
चलना है तो रुकना सीखो,
अहंकार को वश में करके
समय – समय पर झुकना सीखो।

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