अस्पृश्या -आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

अस्पृश्या -आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

 

एक दिन शिशिर की शीत संध्या को
घूमकर आ रहा था वापिस भवन की ओर
नगर के स्वच्छ और पक्के फुटपाथ पर,
इतनी पड़ रही थी ठंड
संसृति की चेतना हुए थी जड़ हिमराशि ।
मानव कृतघ्नता-सी तीक्ष्ण प्राण-भेदिनी
हड्डियां कंपाती
और नस-नस चटकाती हुई
चलती थी भयंकर वात ।
शीत का स्वराज्य था,
मृत्यु-सी शीतल जड़ छाई थी विचित्र शान्ति
पक्षी भी न नीड़ों से बाहर तक झाँकते थे
केवल दो-चार श्रमिक
कभी-कभी नज़र आ जाते थे इधर-उधर
पेट में दबाये सर !
सहसा तीव्र वायु-वेग होने लगा,
और गगन भर गया प्रचंड काल मेघों से ।
ताण्डव आरम्भ हुआ
वाणों की वर्षा-सी झड़ी फिर लग गई,
चलती हुई राह यह जहाँ की तहाँ रुक गई,
मानो सब हलचल हो चुक गई।
उस पथ के पास एक मन्दिर था।
मन्दिर-जहाँ द्वार पर धर्म का पहरा है
ज्ञान-भक्ति नित्य जहाँ शीश झुका आते हैं,
और हम सब के भगवान जहाँ-
भक्तों से निशि-दिन प्रसाद भोग पाते हैं
लेकिन हमारे कभी काम नहीं आते हैं,
बहुत यदि सताओ तो पट बन्द करके सो जाते हैं।

एक क्षण में ही उसी मन्दिर के आँगन में
भीड़ बड़ी जुड़ गई
और लोग करने लगे कीर्तन भगवान का ।
उसी समय-
दूर एक पेड़ के नीचे से
दुख की साकार कृष्ण छाया-सी
दैन्य दारिद्रय की अनकही कथा-सी,
शोषण की प्रथा,
और वाणाविद्ध हंसिनी की व्यथा-सी,
फटे ग्रथित चिथडों में लिपटी
ज्वर के असह्य ताप भार से
काँपती-कराहती-
गिरती सँभलती हुई
अर्धनग्न युवती एक चली आयी इधर ।
जगह-जगह कंकड़ औ’ पत्थर की चोटों से
घायल था उसका तन,
और था चू रहा अजस्र रक्त
रोते हुए घावों से ।
एक बालक था नग्न-
छिपा अस्थि-अंक में
उसके मातृत्व का सजीव स्वप्न
गांधी जवाहर या कि कोई भविष्य का।
बालक था इतना हतसंज्ञ हुआ शीत से
कि
रोने का शब्द भी न मुख से निकलता था ।
देख समवेत जन-पुंज वहाँ मन्दिर में
दूने साहस से वह बढ़ने लगी क्षीणकाय-
बढ़ता है जैसे कोई खोया हुआ पथिक एक-
पास ही देख निज मंज़िल को।
चढ़कर पर ज्यों ही वह सीढ़ियों के पास गई
एक तिलकधारी यूँ पुजारी ने कहा चीख-
“राँड भ्रष्ट करने चली अकलुष भगवान को ।”
रह गई ठिठककर वह वहीं हाय,
मानो हो देखा भयंकर सर्प सामने।
किन्तु मातृ-उर की सजीव ममता-सी वह
गिड़गिड़ा कर बोली संकेत कर बालक को-
‘दया करो इस पर देव ।”
पर न द्रवित हो सका उसका पाषाण हृदय
होता भी कैसे भला-
आख़िर को था तो पत्थर का पुजारी वह
क्रोध कर बोला यूँ-
“भाग जा यहाँ से नहीं लात अभी खाएगी !’
इसके ही पूर्व किन्तु युवती थी गिर पड़ी
उसके जड़ चरणों पर
और धो रही थी मल उनका जल धारा से
या कि धो रही थी समाज का सजीव कोढ़।
लाल कर आँखें विकराल नर-हिंसक-सा बोला वह-
“भ्रष्टे-पापिष्ठे ! भ्रष्ट का दिया तूने मुझे।”
और दूसरे ही क्षण
युवती थी पड़ी हुई हाय तले सीढ़ियों के-
एक पग ठोकर से-
मन्दिर से दूर-
उसके घर से भी दूर-
जहाँ रहा करता है अशरण-शरण दाता वह !
लेकिन फिर शिशु को-
निश्चेष्ट और मौन देख
किसी आशंका का चिन्तन कर
सिहर उठी,
काँप उठी,
जी उठी,
मर उठी,
तिर उठी नील नयन-सागर में
और निज प्राण का भी ध्यान छोड़ बोली यूँ-
“पूज्य जहाँ बैठे हैं कितने ही श्वान वह-
मेरे प्रवेश से अपावन हो जाएगा?
ज़रा तो दया करो इस अबोध शिशु पर ।”
किन्तु वह पुजारी फुंकार कर गरजा यूँ-
“अपने यारों की सम्पति लिए गोद में
फिरती है भ्रष्ट ! दया-दया चिल्लाती हुई
अपने सतीत्व को टके सेर
गली-गली बेचने वाली !
कुत्तों से ज्यादा अपवित्र है तेरी छाँह ।”

अब न सुन सकी वह और
रह-रह कानों में उसके ये गूँजते थे शब्द-
“अपने सतीत्व को टके सेर
गली-गली बेचने वाली !
कुत्तों से ज्यादा अपवित्र है तेरी छाँह ।”

दूसरे रोज़!
उसी पेड़ की छाँह में पड़ी थी वह क्षीणकाय
मरी हुई
और स्तनों से यह लिपटा था शिशु ऐसे-
जैसे मन माया से-
किन्तु चेतना विहीन !
जहाँ नहीं मानव मानव समान
कैसा यह तेरा दरबार है ?
व्यर्थ ही चमक रहा फैले घने तम में
व्यर्थ ही रूप धरे धूर्त भगवान का
खंड-खंड होजा ओ मन्दिर के स्वर्ण-कलश !
खंड-खंड होजा ओ पाषाण-प्रतिमे आज !
5.6.1946

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