असुमेध जगने-रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की ੴ सतिगुर प्रसादि -शब्द (गुरू ग्रंथ साहिब) -संत नामदेव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sant Namdev Ji 

असुमेध जगने-रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि -शब्द (गुरू ग्रंथ साहिब) -संत नामदेव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sant Namdev Ji

असुमेध जगने ॥
तुला पुरख दाने ॥
प्राग इसनाने ॥1॥

तउ न पुजहि हरि कीरति नामा ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ ॥1॥रहाउ॥

गइआ पिंडु भरता ॥
बनारसि असि बसता ॥
मुखि बेद चतुर पड़ता ॥2॥

सगल धरम अछिता ॥
गुर गिआन इंद्री द्रिड़ता ॥
खटु करम सहित रहता ॥3॥

सिवा सकति स्मबादं ॥
मन छोडि छोडि सगल भेदं ॥
सिमरि सिमरि गोबिंदं ॥
भजु नामा तरसि भव सिंधं 4॥1॥873॥

 

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