असाधारण-दूसरा सप्तक-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

असाधारण-दूसरा सप्तक-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

तापित को स्निग्ध करे,
प्यासे को चैन दे;
सूखे हुए अधरों को
फिर से जो बैन दे
ऐसा सभी पानी है।

लहरों के आने पर,
काई-सा फटे नहीं;
रोटी के लालच मे
तोते-सा रटे नहीं
प्राणी वही प्राणी है।

लँगड़े को पाँव और
लूले को हाथ दे,
सत की संभार में
मरने तक साथ दे,
बोले तो हमेशा सच,
सच से हटे नहीं;
झूट के डराए से
हरगिज डरे नहीं।
सचमुच वही सच्चा है।

माथे को फूल जैसा
अपने को चढ़ा दे जो;
रूकती-सी दुनिया को
आगे बढा दे जो;
मरना वही अच्छा है।

प्राणी का वैसे और
दुनिया मे टोटा नहीं,
कोई प्राणी बड़ा नहीं
कोई प्राणी छोटा नहीं।

 

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