असहनीय-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

असहनीय-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

जब दर्द हद से पार हो जाता है
तब नहीं सूझता कि क्या करूँ,
या शायद कुछ ना हीं करूँ,
तब करना-ना करना मेरे वश
से कोशों दूर चले जाते हैं।

और मैं बन जाता हूँ भुक्तभोगी
अपने ही किये निर्णयों का
या भटकन में चूर अनिर्णयों का
और भोगता हूँ ऐसी व्यथा
कि हार मान जाना बेहतर लगता है,
नियति से संघर्ष करने से।

थक जाता हूँ मैं नियति के क्रूर प्रहारों से,
रुग्ण हृदय पर किये निर्मम अत्याचारों से
जिजीविषा भी जीने की माँगती है दुहाई
और मैं बेसुध पड़ा, मूर्छित हुआ
माँगता हूँ चिर निद्रा की दवाई।

और ये नचिकेता समर से माँगता है
इक विदाई, और पीछे छोड़ देता है
समर में शान से हारे हुये इक विजेता,
इक अप्रतिम योद्धा की परछाईं ।।

 

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