असमर्थ हो तुम-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

असमर्थ हो तुम-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

संयमी सामर्थ्य यूँ संत्रस्त मुझसे,
और अंतर्भाव में असमर्थ हो तुम।

तामसी दृगकुंड के तम हो तपस भी,
अश्रुमय पाषाण पर तुमसे परे हैं!
जलसमाधि स्वयं में लेते निरंतर
कूल पर मेरे तुम्हारे दायरे हैं।
देखती हूँ लिप्त हैं धरती-गगन भी,
चिर प्रणय की श्वास प्रलयंकर पवन में।
किंतु दर्शक मात्र दोनों त्रासदी के,
दूर तुमसे व्यर्थ हूँ मैं व्यर्थ हो तुम।
संयमी सामर्थ्य यूँ संत्रस्त मुझसे,
और अंतर्भाव में असमर्थ हो तुम!

सत्व दारुण ही रहा गिरिवर तुम्हारा,
देखकर भी युग-युगांतर की रुलाई।
प्राण पारावार में भर पावनी के,
हिम-हिमालय की हुई जग में हँसाई।
और वह ‘पथभ्रष्ट’ संयमहीन धारा,
निश्चयी गंतव्य को अन्वर्थ करती।
तुम वही गंतव्य मेरे और मुझमें
मैं स्वयं से अल्प ही,अत्यर्थ हो तुम।
संयमी सामर्थ्य यूँ संत्रस्त मुझसे,
और अंतर्भाव में असमर्थ हो तुम!

 

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