असमर्थता-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

असमर्थता-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

पथ के बीचो-बीच खड़ी दीवार
और मैं देख रहा हूँ !

बढ़ती आती रात
चील-सी पर फैलाए,
और सिमटते जाते
विश्वासों के साए ।
तम का अपने सूरज पर विस्तार
और मैं देख रहा हूँ !

महज़ तनिक से तेज़
हवा के हुए दुधारे,
औंधे मुंह गिर पड़े,
धूल पर सपने सारे,
खिलने के क्षण में ऐसे आसार
और मैं देख रहा हूँ !

धिक् ! मेरा काव्यत्व
कि जिसने टेका माथा,
धिक् मेरा पुंसत्व
कि जिसकी कायर गाथा,
ये अपने से ही अपने की हार
और मैं देख रहा हूँ !

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