अष्ठम सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 9

अष्ठम सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 9

अष्ठम सर्ग

चल, चपल कलम, निज चित्रकूट चल देखें,
प्रभु-चरण-चिन्ह पर सफल भाल-लिपि लेखें।
सम्प्रति साकेत-समाज वहीं है सारा,
सर्वत्र हमारे संग स्वदेश हमारा।

तरु-तले विराजे हुए,-शिला के ऊपर,
कुछ टिके,-घनुष की कोटि टेक कर भू पर,
निज लक्ष-सिद्धि-सी, तनिक घूमकर तिरछे,
जो सींच रहीं थी पर्णकुटी के बिरछे,
उन सीता को, निज मूर्तिमती माया को,
प्रणयप्राणा को और कान्तकाया को,
यों देख रहे थे राम अटल अनुरागी,
योगी के आगे अलख-जोति ज्यों जागी!

अंचल-पट कटि में खोंस, कछोटा मारे,
सीता माता थीं आज नई छवि धारे।
थे अंकुर-हितकर कलश-पयोधर पावन,
जन-मातृ-गर्वमय कुशल वदन भव-भावन।
पहने थीं दिव्य दुकूल अहा! वे ऐसे,
उत्पन्न हुआ हो देह-संग ही जैसे।
कर, पद, मुख तीनों अतुल अनावृत पट-से,
थे पत्र-पुंज में अलग प्रसून प्रकट-से!
कन्धे ढक कर कच छहर रहे थे उनके,-
रक्षक तक्षक-से लहर रहे थे उनके।
मुख धर्म-बिन्दु-मय ओस-भरा अम्बुज-सा,
पर कहाँ कण्टकित नाल सुपुलकित भुज-सा?
पाकर विशाल कच-भार एड़ियाँ धँसतीं,
तब नखज्योति-मिष, मृदुल अँगुलियाँ हँसतीं।
पर पग उठने में भार उन्हीं पर पड़ता,
तब अरुण एड़ियों से सुहास्य-सा झड़ता!
क्षोणी पर जो निज छाप छोड़ते चलते,
पद-पद्मों में मंजीर-मराल मचलते।
रुकने-झुकने में ललित लंक लच जाती,
पर अपनी छवि में छिपी आप बच जाती।
तनु गौर केतकी-कुसुम-कली का गाभा,
थी अंग-सुरभि के संग तरंगित आभा।
भौंरों से भूषित कल्प-लता-सी फूली,
गातीं थीं गुनगुन गान भान-सा भूली:-

“निज सौध सदन में उटज पिता ने छाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

सम्राट स्वयं प्राणेश, सचिव देवर हैं,
देते आकर आशीष हमें मुनिवर हैं।
धन तुच्छ यहाँ,-यद्यपि असंख्य आकर हैं,
पानी पीते मृग-सिंह एक तट पर हैं।

सीता रानी को यहाँ लाभ ही लाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

क्या सुन्दर लता-वितान तना है मेरा,
पुंजाकृति गुंजित कुंज घना है मेरा।
जल निर्मल, पवन पराग-सना है मेरा,
गढ़ चित्रकूट दृढ़-दिव्य बना है मेरा।

प्रहरी निर्झर, परिखा प्रवाह की काया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ,
अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ।
श्रमवारिविन्दुफल, स्वास्थ्यशुक्ति फलती हूँ,
अपने अंचल से व्यजन आप झलती हूँ॥

तनु-लता-सफलता-स्वादु आज ही आया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया॥

जिनसे ये प्रणयी प्राण त्राण पाते हैं
जी भर कर उनको देख जुड़ा जाते हैं।
जब देव कि देवर विचर-विचर आते हैं,
तब नित्य नये दो-एक द्रव्य लाते हैं॥

उनका वर्णन ही बना विनोद सवाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया॥

किसलय-कर स्वागत-हेतु हिला करते हैं,
मृदु मनोभाव-सम सुमन खिला करते हैं।
डाली में नव फल नित्य मिला करते हैं,
तृण तृण पर मुक्ता-भार झिला करते हैं।

निधि खोले दिखला रही प्रकृति निज माया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

कहता है कौन कि भाग्य ठगा है मेरा?
वह सुना हुआ भय दूर भगा है मेरा।
कुछ करने में अब हाथ लगा है मेरा,
वन में ही तो ग्रार्हस्थ्य जगा है मेरा,

वह बधू जानकी बनी आज यह जाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

फल-फूलों से हैं लदी डालियाँ मेरी,
वे हरी पत्तलें, भरी थालियाँ मेरी।
मुनि बालाएँ हैं यहाँ आलियाँ मेरी,
तटिनी की लहरें और तालियाँ मेरी।

क्रीड़ा-साम्राज्ञी बनी स्वयं निज छाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

मैं पली पक्षिणी विपिन-कुंज-पिंजर की,
आती है कोटर-सदृश मुझे सुध घर की।
मृदु-तीक्ष्ण वेदना एक एक अन्तर की,
बन जाती है कल-गीति समय के स्वर की।

कब उसे छेड़ यह कंठ यहाँ न अघाया?
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

गुरुजन-परिजन सब धन्य ध्येय हैं मेरे,
ओषधियों के गुण-विगुण ज्ञेय हैं मेरे।
वन-देव-देवियाँ आतिथेय हैं मेरे,
प्रिय-संग यहाँ सब प्रेय-श्रेय हैं मेरे।

मेरे पीछे ध्रुव-धर्म स्वयं ही धाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

नाचो मयूर, नाचो कपोत के जोड़े,
नाचो कुरंग, तुम लो उड़ान के तोड़े।
गाओ दिवि, चातक, चटक, भृंग भय छोड़े,
वैदेही के वनवास-वर्ष हैं थोड़े।

तितली, तूने यह कहाँ चित्रपट पाया?
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

आओ कलापि, निज चन्द्रकला दिखलाओ,
कुछ मुझसे सीखो और मुझे सिखलाओ।
गाओ पिक,मैं अनुकरण करूँ, तुम गाओ,
स्वर खींच तनिक यों उसे घुमाते जाओ।

शुक, पढ़ो,-मधुर फल प्रथम तुम्हीं ने खाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

अयि राजहंसि, तू तरस तरस क्यों रोती,
तू शुक्ति-वंचिता कहीं मैथिली होती
तो श्यामल तनु के श्रमज-बिन्दुमय मोती
निज व्यजन-पक्ष से तू अँकोर सुध खोती,-

जिन पर मानस ने पद्म-रूप मुँह बाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

ओ निर्झर, झरझर नाद सुना कर झड़ तू।
पथ के रोड़ों से उलझ-सुलझ, बढ़, अड़ तू।
ओ उत्तरीय, उड़, मोद-पयोद, घुमड़ तू,
हम पर गिरि-गद्गद भाव, सदैव उमड़ तू।

जीवन को तूने गीत बनाया, गाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

ओ भोली कोल-किरात-भिल्ल-बालाओ,
मैं आप तुम्हारे यहाँ आगई, आओ।
मुझको कुछ करने योग्य काम बतलाओ,
दो अहो! नव्यता और भव्यता पाओ।

लो, मेरा नागर भाव भेट जो लाया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

सब ओर लाभ ही लाभ बोध-विनिमय में,
उत्साह मुझे है विविध वृत्त-संचय में।
तुम अर्द्ध नग्न क्यों रहो अशेष समय में,
आओ, हम कातें-बुनें गान की लय में।

निकले फूलों का रंग, ढंग से ताया,
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।

थे समाधिस्थ से राम अनाहत सुनते,
स्वर पत्र पत्र पर प्रेम-जाल थे बुनते।
कितने मीठे हैं, मरे बीन के झाले,
तरु झूम रहे थे हरे-भरे मतवाले।
“गाओ मैथिलि, स्वच्छन्द, राम के रहते;
सुन ले कोई भी आज मुझे यह कहते-
निश्चिन्त रहे, जो करे भरोसा मेरा,
बस, मिले प्रेम का मुझे परोसा मेरा।
आनन्द हमारे ही अधीन रहता है,
तब भी विषाद नरलोक व्यर्थ सहता है।
करके अपना कर्तव्य रहो संतोषी,
फिर सफल हो कि तुम विफल, न होगे दोषी।
निश्चिन्त नारियाँ आत्म-समर्पण करके,
स्वीकृति में ही कृत्कृत्य भाव हैं नर के।
गौरव क्या है, जन-भार वहन करना ही,
सुख क्या है, बढ़ कर दुःख सहन करना ही।”
कलिकाएँ खिलने लगीं, फूल फिर फूले,
खग-मृग भी चरना छोड़ सभी सुध भूले!
सन्नाटे में था एक यही रव छाया-
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया!

देवर के शर की अनी बनाकर टाँकी
मैंने अनुजा की एक मूर्त्ति है आँकी।
आँसू नयनों में, हँसी वदन पर बाँकी,
काँटे समेटती, फूल छींटती झाँकी!

निज मन्दिर उसने यही कुटीर बनाया!
मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।”

“हा! ठहरो, बस, विश्राम प्रिये, लो थोड़ा,
हे राजलक्ष्मि, तुमने न राम को छोड़ा।
श्रम करो, स्वेदजल स्वास्थ्य-मूल में ढालो,
पर तुम यति का भी नियम स्वगति में पालो।
तन्मय हो तुम-सा किसी कार्य में कोई,
तुमने अपनी भी आज यहाँ सुध खोई!
हो जाना लता न आप लता-संलग्ना,
करतल तक तो तुम हुईं नवल-दल-मग्ना!
ऐसा न हो कि मैं फिरूँ खोजता तुमको
है मधुप ढूँढ़ता यथा मनोज्ञ कुसुम को!
वह सीताफल जब फलै तुम्हारा चाहा,-
मेरा विनोद तो सफल,-हँसीं तुम आहा!”
“तुम हँसो, नाथ निज इन्द्रजाल के फल पर,
पर ये फल होंगे प्रकट सत्य के बल पर।
उनमें विनोद, इनमें यथार्थता होगी,
मेरे श्रम-फल के रहें सभी रस-भोगी।
तुम मायामय हो तदपि बड़े भोले हो,
हँसने में भी तो झूठ नहीं बोले हो।
हो सचमुच क्या आनन्द, छिपूँ मैं वन में,
तुम मुझे खोजते फिरो गभीर गहन में!”
“आमोदिनि, तुमको कौन छिपा सकता है?
अन्तर को अन्तर अनायास तकता है।
बैठी है सीता सदा राम के भीतर,
जैसे विद्युद्द्युति घनश्याम के भीतर।”

“अच्छा, ये पौधे कहो फलेंगे कब लौं?
हम और कहीं तो नहीं चलेंगे तब लौं?”
“पौधे? सींचो ही नहीं, उन्हें गोड़ो भी,
डालों को, चाहे जिधर, उधर मोड़ो भी।”
“पुरुषों को तो बस राजनीति की बातें!
नृप में, माली में, काट छाँट की घातें।
प्राणेश्वर, उपवन नहीं, किन्तु यह वन है,
बढ़ते हैं विटपी जिधर चाहता मन है।
बन्धन ही का तो नाम नहीं जनपद है?
देखो, कैसा स्वच्छन्द यहाँ लघु नद है।
इसको भी पुर में लोग बाँध लेते हैं।”
“हाँ, वे इसका उपयोग बढ़ा देते हैं।”
“पर इससे नद का नहीं, उन्हीं का हित है,
पर बन्धन भी क्या स्वार्थ-हेतु समुचित है?”

“मैं तो नद का परमार्थ इसे मानूँगा
हित उसका उससे अधिक कौन जानूँगा?
जितने प्रवाह हैं, बहें-अवश्य बहें वे,
निज मर्यादा में किन्तु सदैव रहें वे।
केवल उनके ही लिये नहीं यह धरणी,
है औरों की भी भार-धारिणी-भरणी।
जनपद के बन्धन मुक्ति-हेतु हैं सब के,
यदि नियम न हों, उच्छिन्न सभी हों कब के।
जब हम सोने को ठोक-पीट गढ़ते हैं,
तब मान, मूल्य, सौन्दर्य, सभी बढ़ते हैं।
सोना मिट्टी में मिला खान में सोता,
तो क्या इससे कृत्कृत्य कभी वह होता?”
“वह होता चाहे नहीं, किन्तु हम होते,
हैं लोग उसी के लिए झींकते-रोते!”
“होकर भी स्वयं सुवर्णमयी, ये बातें?
पर वे सोने की नहीं, लोभ की घातें।
यों तो फिर कह दो-कहीं न कुछ भी होता,
निर्द्वन्द्व भाव ही पड़ा शून्य में सोता!”
“हम तुम तो होते कान्त!” “न थे कब कान्ते!
हैं और रहेंगे नित्य विविध वृत्तान्ते!
हमको लेकर ही अखिल सृष्टि की क्रीड़ा,
आनन्दमयी नित नई प्रसव की पीड़ा!”
“फिर भी नद का उपयोग हमारे लेखे,
किसने हैं उसके भाव सोच कर देखे?”
“पर नद को ही अवकाश कहाँ है इसका?
सोचो, जीवन है श्लाघ्य स्वार्थमय किसका?
करते हैं जब उपकार किसीका हम कुछ,
होता है तब सन्तोष हमें क्या कम कुछ?
ऐसा ही नद के लिए मानते हैं हम,
अपना जैसा ही उसे जानते हैं हम।
जल निष्फल था यदि तृषा न हममें होती,
है वही उगाता अन्न, चुगाता मोती।
निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी,
हम हों समष्टि के लिए व्यष्टि-बलिदानी।”

“तुम इसी भाव से भरे यहाँ आये हो?
यह धनश्याम, तनु धरे हरे, छाये हो।
तो बरसो, सरसै, रहे न भूमि जली-सी,
मैं पाप-पुंज पर टूट पडूँ बिजली-सी।”
“हाँ, इसी भाव से भरा यहाँ आया मैं,
कुछ देने ही के लिये प्रिये, लाया मैं।
निज रक्षा का अधिकार रहे जन जन को,
सबकी सुविधा का भार किन्तु शासन को।
मैं आर्यों का आदर्श बताने आया,
जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।
सुख-शान्ति-हेतु मैं क्रान्ति मचाने आया,
विश्वासी का विश्वास बचाने आया।
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं,
जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन, शापित हैं।
हो जायँ अभय वे जिन्हें कि भय भासित हैं,
जो कौणप-कुल से मूक-सदृश शासित हैं।
मैं आया, जिसमें बनी रहै मर्यादा,
बच जाय प्रलय से, मिटै न जीवन सादा;
सुख देने आया, दुःख झेलने आया;
मैं मनुष्यत्व का नाट्य खेलने आया।
मैं यहाँ एक अवलम्ब छोड़ने आया,
गढ़ने आया हूँ, नहीं तोड़ने आया।
मैं यहाँ जोड़ने नहीं, बाँटने आया,
जगदुपवन के झंखाड़ छाँटने आया।

मैं राज्य भोगने नहीं, भुगाने आया,
हंसों को मुक्ता-मुक्ति चुगाने आया।
भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया!
सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।
अथवा आकर्षण पुण्यभूमि का ऐसा
अवतरित हुआ मैं, आप उच्च फल जैसा।
जो नाम मात्र ही स्मरण मदीय करेंगे,
वे भी भवसागर बिना प्रयास तरेंगे।
पर जो मेरा गुण, कर्म, स्वभाव धरेंगे,
वे औरों को भी तार पार उतरेंगे।”
“पर होगा यह उद्देश्य सिद्ध क्या वन में?
सम्भव है चिन्तन-मनन मात्र निर्जन में।”
“वन में निज साधन सुलभ धर्मणा होगा,
जब मनसा होगा तब न कर्मणा होगा?
बहु जन वन में हैं बने ऋक्ष-वानर-से,
मैं दूँगा अब आर्यत्व उन्हें निज कर से।
चल दण्डक वन में शीघ्र निवास करूँगा,
निज तपोघनों के विघ्न विशेष हरूँगा।

उच्चारित होती चले वेद की वाणी,
गूँजै गिरि-कानन-सिन्घु-पार कल्याणी।
अम्बर में पावन होम-धूम घहरावे,
वसुधा का हरा दुकूल भरा लहरावै।
तत्त्वों का चिन्तन करें स्वस्थ हो ज्ञानी,
निर्विघ्न ध्यान में निरत रहें सब ध्यानी।
आहुतियाँ पड़ती रहें अग्नि में क्रम से,
उस तपस्त्याग की विजय-वृद्धि हो हम से।
मुनियों को दक्षिण देश आज दुर्गम है,
बर्बर कौणप-गण वहाँ उग्र यम-सम है।
वह भौतिक मद से मत्त यथेच्छाचारी,
मेटूँगा उसकी कुगति-कुमति मैं सारी।”

“पर यह क्या, खग-मृग भीत भगे आते हैं,
मानों पीछे से व्याध लगे आते हैं।
चर्चा भी अच्छी नहीं बुरों की मानों,
साँपों की बातें जहाँ, वहीं वे जानों।
अस्फुट कोलाहल भरित मर्मरित वन है,
वह धूलि-धूसरित उच्च गभीर गगन है।

देखो, यह मेरा नकुल देहली पर से
बाहर की गति-विधि देख रहा है डर से।
लो, ये देवर आ रहे बाढ़ के जल-से,
पल पल में उथले-भरे, अचल-चंचल से!
होगी ऐसी क्या बात, न जानें स्वामी,
भय न हो उन्हें, जो सदय पुण्य-पथ-गामी।”

“भाभी, भय का उपचार चाप यह मेरा,
दुगुना गुणमय आकृष्ट आप यह मेरा।
कोटिक्रम-सम्मुख कौन टिकेगा इसके-
आई परास्तता कर्म भोग में जिसके।
सुनता हूँ, आये भरत यहाँ दल-बल से,
वन और गगन है विकल चमू-कलकल से।
विनयी होकर भी करें न आज अनय वे,
विस्मय क्या है, क्या नहीं स्वमातृतनय वे?
पर कुशल है कि असमर्थ नहीं हैं हम भी,
जैसे को तैसे, एक बार हो यम-भी।
हे आर्य, आप गम्भीर हुए क्यों ऐसे-
निज रक्षा में भी तर्क उठा हो जैसे?
आये होंगे यदि भरत कुमति-वश वन में,
तो मैंने यह संकल्प किया है मन में-
उनको इस शर का लक्ष्य का चुनूँगा क्षण में,-
प्रतिषेध आपका भी न सुनूँगा रण में!”

“गृह-कलह शान्त हो, हाय! कुशल हो कुल की,
अक्षुण्ण अतुलता रहै सदैव अतुल की।
विग्रह के ग्रह का कोप न जानें अब क्यों,
आ बैठे देवर, राज्य छोड़ तुम जब यों?”

“भद्रे, न भरत भी उसे छोड़ आये हों,
मातुश्री से भी मुँह न मोड़ आये हों।
लक्ष्मण, लगता है यही मुझे हे भाई,
पीछे न प्रजा हो पुरी शून्य कर आई।”
“आशा अन्तःपुर-मध्यवासिनी कुलटा,
सीधे हैं आप, परन्तु जगत है उलटा।
जब आप पिता के वचन पाल सकते हैं,
तब माँ की आज्ञा भरत टाल सकते हैं?”
“भाई, कहने को तर्क अकाट्य तुम्हारा,
पर मेरा ही विश्वास सत्य है सारा।
माता का चाहा किया राम ने आहा!
तो भरत करेंगे क्यों न पिता का चाहा?”
“मानव-मन दुर्बल और सहज चंचल है,
इस जगती-तल में लोभ अतीव प्रबल है।
देवत्व कठिन, दनुजत्व सुलभ है नर को,
नीचे से उठना सहज कहाँ ऊपर को?”
“पर हम क्यों प्राकृत-पुरुष आप को मानें?
निज पुरुषोत्तम की प्रकृति क्यों न पहचानें?
हम सुगति छोड़ क्यों कुगति विचारें जन की?
नीचे-ऊपर सर्वत्र तुल्य गति मन की।”
“बस हार गया मैं आर्य, आपके आगे,
तब भी तनु में शत पुलक भाव हैं जागे!”
“देवर, मैं तो जी गई, मरी जाती थी,
विग्रह की दारुण मूर्ति दृष्टि आती थी।
अच्छा ले आये आर्यपुत्र, तुम इनको;
ये तुम्हें छोड़ कब, कहाँ मानते किनको?
सन्तोष मुझे है आज, यहाँ देवर ये;
हा! क्या जानें, क्या न कर बैठते घर ये।”
“पर मैं चिन्तित हूँ, सहज प्रेम के कारण
हठ पूर्वक मुझको भरत करें यदि वारण?
वह देखो, वन के अन्तराल से निकले,
मानों दो तारे क्षितिज-जाल से निकले।
वे भरत और शत्रुघ्न, हमीं दो मानों,
फिर आया हमको यहाँ प्रिये, तुम जानों।”
कहते-कहते प्रभु उठे, बढ़े वे आगे,
सीता-लक्ष्मण भी संग चले अनुरागे।

देखी सीता ने स्वयं साक्षिणी हो हो,-
प्रतिमाएँ सम्मुख एक एक की दो दो!
रह गये युग्म स्वर्वैद्य आप ही आधे
जगती ने थे निज चार चिकित्सक साधे!
दोनों आगत आ गिरे दण्डवत् नीचे,
दोनों से दोनों गये हृदय पर खींचे।
सीता-चरणामृत बना नयन-जल उनका,
इनका दृगम्बु अभिषेक सुनिर्मल उनका!
“रोकर रज में लोटो न भरत, ओ भाई,
यह छाती ठंढी करो सुमुख, सुखदायी।
आँखों के मोती यों न बिखेरो, आओ,
उपहार-रूप यह हार मुझे पहनाओ।”
“हा आर्य, भरत का भाग्य रजोमय ही है,
उर रहते उर्वी उसे तुम्हीं ने दी है।
उस जड़ जननी का विकृत वचन तो पाला,
तुमने इस जन की ओर न देखा-भाला!”
“ओ निर्दय, करदे न यों निरुत्तर मुझको,
रे भाई, कहना यही उचित क्या तुझको?
चिरकाल राम है भरत-भाव का भूखा,
पर उसको तो कर्तव्य मिला है रूखा!”

इतने में कलकल हुआ वहाँ जय जय का,
गुरुजन सह पुरजन-पंच-सचिव-समुदय का।
हय-गज-रथादि निज नाद सुनाते आये,
खोये-से अपने प्राण सभी ने पाये।
क्या ही विचित्रता चित्रकूट ने पाई,
सम्पूर्ण अयोध्या जिसे खोजती आई।
बढ़ कर प्रणाम कर वसिष्ठादि मुनियों को,
प्रभु ने आदर से लिया गृही गुनियों को।

जिस पर पाले का एक पर्त-सा छाया,
हत जिसकी पंकज-पंक्ति, अचल-सी काया,

उस सरसी-सी, आभरणरहित, सितवसना,
सिहरे प्रभु माँ को देख, हुई जड़ रसना।
“हा तात!” कहा चीत्कार समान उन्होंने,
सीता सह लक्ष्मण लगे उसी क्षण रोने।
उमड़ा माँओं का हृदय हाय ज्यों फट कर,-
“चिर मौन हुए वे तात तुम्हीं को रटकर।”
“जितने आगत हैं रहें क्यों न गतधर्मा,
पर मैं उनके प्रति रहा क्रूर ही कर्मा।”
दी गुरु वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना बढ़ कर,-
“वे समुपस्थित सर्वत्र कीर्ति पर चढ़ कर।
वे आप उऋण ही नहीं हुए जीवन से,
उलटा भव को कर गये ऋणी निज धन से।
वे चार चार दे गये एक के बदले,
तुम तक को यों तज गये टेक के बदले!
वे हैं अशोच्य, हाँ स्मरण-योग्य हैं सबके,
अभिमान-योग्य, अनुकरण-योग्य हैं सबके।”
बोले गुरु से प्रभु साश्रुवदन, बद्धांजलि-
“दे सकता हूँ क्या उन्हें अभी श्रद्धांजलि?
पितृ-देव गये हैं तृषित-भाव से सुरपुर!”
भर आया उनका गला, हुआ आतुर उर।

फिर बोले वे-“क्या करूँ और मैं कहिए,
गुरुदेव, आप ही तात-तुल्य अब रहिए।”
“वह भार प्राप्त है मुझे प्रपूर्ण प्रथम ही,
हम जब जो उनके लिए करें, है कम ही।”
“भगवन्, इस जन में भक्तिभाव अविचल है,
पर अर्पणार्थ बस पत्र-पुष्प-फल-जल है।”
“हा! याद न आवे उन्हें तुम्हारे वन की?”
प्रभु-जननी रोने लगीं व्यथा से मन की।
“वे सब दुःखों से परे आज हैं देवी,
स्वर्गीय भाव से भरे आज हैं देवी।
उनको न राम-वनवास देख दुख होगा,
अवलोक भरत का वही भाव सुख होगा।”
गुरु-गिरा श्रवण कर सभी हुए गद्गद से;
बोले तब राघव भरे स्नेह के नद-से,-
“पूजा न देख कर देव भक्ति देखेंगे,
थोड़े को भी वे सदय बहुत लेखेंगे।”
कौसल्या को अब रहा न मान-परेखा,
पर कैकेयी की ओर उन्होंने देखा।
बोली वह अपना कण्ठ परिष्कृत करके,
प्रभु के कन्धे पर वलय-शून्य कर धरके-

“है श्रद्धा पर ही श्राद्ध, न आडम्बर पर,
पर तुम्हें कमी क्या, करो, कहें जो गुरुवर।”
यह कह मानों निज भार उतारा उसने,
लक्ष्मण-जननी की ओर निहारा उसने।
कुछ कहा सुमित्रा ने न अश्रुमय मुख से,
सिर से अनुमति दी नेत्र पोंछ कर दुख से।
“जो आज्ञा” कह प्रभु घूम अनुज से बोले-
“लेकर अपने कुछ चुने वनेचर भोले,
सबका स्वागत सत्कार करो तुम तबलौं,
मैं करूँ स्वयं करणीय कार्य सब जबलौं।”

यह कह सीता-सह नदी-तीर प्रभु आये,
श्रद्धा-समेत सद्धर्म समान सुहाये।
पीछे परिजन विश्वास-सदृश थे उनके
फल-सम लक्ष्मण ने दिया आपको चुनके।

पट-मण्डप चारों ओर तनें मन भाये,
जिन पर रसाल, मधु, निम्ब, जम्बु वट छाये।
मानों बहु कटि-पट चित्रकूट ने पाये।
किंवा नूतन घन उसे घेर घिर आये।

आलान बने द्रुम-काण्ड गजों के जैसे,
गज-निगड़ वलय बन गये द्रुमों के वैसे।
च्युत पत्र पीठ पर पड़े, फुरहरी आई,
घोड़ों ने ग्रीवा मोड़ दृष्टि दौड़ाई।
नव उपनिवेश-सा बसा घड़ी भर ही में,
समझा लोगों ने कि हैं सभी घर ही में।
लग गई हाट जिसमें न पड़े कुछ देना,
ले लें उसमें जो वस्तु जिन्हें हो लेना।
बहु कन्द-मूल-फल कोल-भील लाते थे,
पहुँचाते थे सर्वत्र, प्रीति पाते थे-
“बस, पत्र-पुष्प हम वन्यचरों की सेवा,
महुवा मेवा है, बेर कलेवा, देवा!”

उस ओर पिता के भक्ति-भाव से भरके,
अपने हाथों उपकरण इकट्ठे करके,
प्रभु ने मुनियों के मध्य श्राद्ध-विधि साधी,
ज्यों दण्ड चुकावे आप अवश अपराधी।
पाकर पुत्रों में अटल प्रेम अघटित-सा,
पितुरात्मा का परितोष हुआ प्रकटित-सा।
हो गई होम की शिखा समुज्ज्वल दूनी,
मन्दानिल में मिल खिलीं धूप की धूनी।
अपना आमंत्रित अतिथि मानकर सबको,
पहले परोस परितृप्ति-दान कर सबको,
प्रभु ने स्वजनों के साथ किया भोजन यों,
सेवन करता है मन्द पवन उपवन ज्यों।

तदन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे।
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।
उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह रह कर,
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह मह कर।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
प्रभु बोले गिरा गभीर नीरनिधि जैसी।
“हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना;”
सब सजग हो गये, भंग हुआ ज्यों सपना।
“हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?
मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?
पाया तुमने तरु-तले अरण्य-बसेरा,
रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा?
तनु तड़प तड़प कर तप्त तात ने त्यागा,
क्या रहा अभीप्सित और तथापि अभागा?
हा! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,
निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा।
अब कौन अभीप्सित और आर्य वह किसका?
संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।
मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा,
हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा?”
प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा;
रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा!
“उसके आशय की थाह मिलेगी किसको,
जन कर जननी ही जान न पाई जिसको?”

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।”
चौंके सब सुन कर अटल केकयी-स्वर को।
सबने रानी की ओर अचानक देखा,
वैधव्य-तुषारावृता यथा विधु-लेखा।
बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा,
वह सिंही अब थी हहा! गोमुखी गंगा-
“हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना,
सब सुन लें तुमने स्वयं अभी यह माना।
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया,
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।
दुर्बलता का ही चिन्ह विशेष शपथ है,
पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है?
यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ,
तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ।
ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो,
पाओ यदि उसमें सार उसे सब चुन लो।
करके पहाड़-सा पाप मौन रह जाऊँ?
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ?”
थी सनक्षत्र शशि-निशा ओस टपकाती,
रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती।
उल्का-सी रानी दिशा दीप्ति करती थी;
सब में भय-विस्मय और खेद भरती थी।

“क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी,
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी।
जल पंजर-गत अब अरे अधीर, अभागे,
वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझी में जागे।
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?
क्या शेष बचा था कुछ न और इस जन में?
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य-मात्र, क्या तेरा?
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा।
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके?
छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे,
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे?
कहते आते थे अभी यही नर-देही,
’माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।’
अब कहें सभी यह हाय! विरुद्ध विधाता,-
’हैं पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’
बस मैंने इसका वाह्य मात्र ही देखा,
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा।
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा!

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
’रघुकुल में भी थी एक अभागी रानी।’
निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा-
’धिक्कार उसे था महा स्वार्थ ने घेरा।’-”
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई-
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।”

“हा! लाल? उसे भी आज गमाया मैंने,
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने।
निज स्वर्ग उसी पर वार दिया था मैंने,
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने।
पर वही आज यह दीन हुआ रोता है,
शंकित सब से घृत हरिण-तुल्य होता है।
श्रीखण्ड आज अंगार-चण्ड है मेरा,
फिर इससे बढ़ कर कौन दण्ड है मेरा?

पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में,
जन क्या क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में?
हा! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी?
मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी।
हा दया! हन्त वह घृणा! अहह वह करुणा!
वैतरणी-सी हैं आज जान्हवी-वरुणा!!
सह सकती हूँ चिरनरक, सुनें सुविचारी,
पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी।
लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा,
मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा।
घर चलो इसी के लिए, न रूठो अब यों,
कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,
मेरे दुगने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे।
मैं इसे न जानूँ, किन्तु जानते हो तुम,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,
यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा,
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा,
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा,
आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर,
समझावें तुमको अतुल युक्तियाँ देकर।

मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा,
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा।
देवों की ही चिरकाल नहीं चलती है,
दैत्यों की भी दुर्वृत्ति यहाँ फलती है।”
हँस पड़े देव केकयी-कथन यह सुन कर,
रो दिये क्षुब्ध दुर्दैव दैत्य सिर धुनकर!
“छल किया भाग्य ने मुझे अयश देने का,
बल दिया उसी ने भूल मान लेने का।
अब कटे सभी वे पाश नाश के प्रेरे;
मैं वही केकयी, वही राम तुम मेरे।
होने पर बहुधा अर्द्ध रात्रि अन्धेरी
जीजी आकर करतीं पुकार थीं मेरी-
’लो कुहकिनि, अपना कुहक, राम यह जागा,
निज मँझली माँ का स्वप्न देख उठ भागा!’
भ्रम हुआ भरत पर मुझे व्यर्थ संशय का,
प्रतिहिंसा ने ले लिया स्थान तब भय का।
तुम पर भी ऐसी भ्रान्ति भरत से पाती
तो उसे मनाने भी न यहाँ मैं आती!-
जीजी ही आतीं, किन्तु कौन मानेगा?
जो अन्तर्यामी, वही इसे जानेगा।”

“हे अम्ब, तुम्हारा राम जानता है सब,
इस कारण वह कुछ खेद मानता है कब?”
“क्या स्वाभिमान रखती न केकयी रानी?
बतलादे कोई मुझे उच्चकुल-मानी।
सहती कोई अपमान तुम्हारी अम्बा?
पर हाय, आज वह हुई निपट नालम्बा।
मैं सहज मानिनी रही, वही क्षत्राणी,
इस कारण सीखी नहीं दैन्य यह वाणी।
पर महा दीन हो गया आज मन मेरा,
भावज्ञ, सहेजो तुम्हीं भाव-धन मेरा।
समुचित ही मुझको विश्व-घृणा ने घेरा,
समझाता कौन सशान्ति मुझे भ्रम मेरा?
यों ही तुम वन को गये, देव सुरपुर को,
मैं बैठी ही रह गई लिए इस उर को!
बुझ गई पिता की चिता भरत-भुजधारी,
पितृभूमि आज भी तप्त तथापि तुम्हारी।
भय और शोक सब दूर उड़ाओ उसका,
चलकर सुचरित, फिर हृदय जुड़ाओ उसका।
हो तुम्हीं भरत के राज्य, स्वराज्य सम्हालो;
मैं पाल सकी न स्वधर्म, उसे तुम पालो।
स्वामी को जीते जी न दे सकी सुख मैं,
मर कर तो उनको दिखा सकूँ यह मुख मैं।
मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा,
पर भरत-वाक्य है-सहूँ विश्व की व्रीड़ा।
जीवन-नाटक का अन्त कठिन है मेरा,
प्रस्ताव मात्र में जहाँ अधैर्य अँधेरा।
अनुशासन ही था मुझे अभी तक आता,
करती है तुमसे विनय आज यह माता।”

“हा मातः, मुझको करो न यों अपराधी,
मैं सुन न सकूँगा बात और अब आधी।
कहती हो तुम क्यों अन्य-तुल्य यह वाणी;
क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं वह मानी?
इस भाँति मना कर हाय, मुझे न रुठाओ,
जो उठूँ न मैं, क्यों तुम्हीं न आप उठाओ।
वे शैशव के दिन आज हमारे बीते,
माँ के शिशु क्यों शिशु ही न रहे मनचीते?
तुम रीझ-खीझ कर कोप जनातीं मुझको,
हँस आप रुठातीं, आप मनातीं मुझको।
वे दिन बीते, तुम जीर्ण दुःख की मारी,
मैं बड़ा हुआ अब और साथ ही भारी।
अब उठा सकोगी तुम न तीन में कोई,”
“तुम हलके कब थे”-हँसी केकयी, रोई!
“माँ, अब भी तुमसे राम विनय चाहेगा?
अपने ऊपर क्या आप अद्रि ढाहेगा?
अब तो आज्ञा की अम्ब, तुम्हारी वारी,
प्रस्तुत हूँ मैं भी धर्मधनुर्धृतिधारी।
जननी ने मुझको जना, तुम्हीं ने पाला,
अपने साँचे में आप यत्न से ढाला।
सब के ऊपर आदेश तुम्हारा मैया,
मैं अनुचर पूत; सपूत, प्यार का भैया।
वनवास लिया है मान तुम्हारा शासन,
लूँगा न प्रजा का भार, राज-सिंहासन?
पर यह पहला आदेश प्रथम हो पूरा,
वह तात-सत्य भी रहे न अम्ब, अधूरा,
जिस पर हैं अपने प्राण उन्होंने त्यागे;
मैं भी अपना व्रत-नियम निबाहूँ आगे।
निष्फल न गया माँ, यहाँ भरत का आना,
सिरमाथे मैंने वचन तुम्हारा माना।
सन्तुष्ट मुझे तुम देख रही हो वन में,
सुख धन-धरती में नहीं, किन्तु निज मन में।
यदि पूरा प्रत्यय न हो तुम्हें इस जन पर,
तो चढ़ सकते हैं राजदूत तो घन पर!”

“राघव, तेरे ही योग्य कथन है तेरा,
दृढ़ बाल-हठी तू वही राम है मेरा।
देखें हम तेरा अवधि-मार्ग सब सह कर।”
कौसल्या चुप हो गई आप यह कह कर।
ले एक साँस रह गई सुमित्रा भोली,
कैकेयी ही फिर रामचन्द्र से बोली-
“पर मुझको तो परितोष नहीं है इससे,
हा! तब तक मैं क्या कहूँ सुनूँगी किससे?”
“जीती है अब भी अम्ब, उर्मिला बेटी;
इन चरणों की चिरकाल रहूँ मैं चेटी।”
“रानी, तू ने तो रुला दिया पहले ही,
यह कह काँटों पर सुला दिया पहले ही!
आ, मेरी सबसे अधिक दुःखिनी, आ जा,
पिस मुझसे चंदन-लता मुझी पर छा जा!

हे वत्स, तुम्हें वनवास दिया मैंने ही,
अब उसका प्रत्याहार किया मैंने ही।”
“पर रघुकुल में जो वचन दिया जाता है,
लौटा कर वह कब कहाँ लिया जाता है?
क्यों व्यर्थ तुम्हारे प्राण खिन्न होते हैं,
वे प्रेम और कर्तव्य भिन्न होते हैं?
जाने दो, निर्णय करें भरत ही सारा-
मेरा अथवा है, कथन यथार्थ तुम्हारा।
मेरी-इनकी चिर पंच रहीं तुम माता,
हम दोनों के मध्यस्थ आज ये भ्राता।”

“हा आर्य! भरत के लिये और था इतना?”
“बस भाई, लो माँ, कहें और ये कितना?”
“कहने को तो है बहुत दुःख से सुख से,
पर आर्य! कहूँ तो कहूँ आज किस मुख से?
तब भी है तुमसे विनय, लौट घर जाओ।”
“इस ’जाओ’ का क्या अर्थ, मुझे बतलाओ?”
“प्रभु, पूर्ण करूँगा यहाँ तुम्हारा व्रत मैं।”
“पर क्या अयोग्य, असमर्थ और अनिरत मैं?
“यह सुनना भी है पाप, भिन्न हूँ क्या मैं?”
“इस शंका से भी नहीं खिन्न हूँ क्या मैं?-
हम एकात्मा हैं, तदपि भिन्न है काया।”
“तो इस काया पर नहीं मुझे कुछ माया।
सड़ जाय पड़ी यह इसी उटज के आगे,
मिल जायँ तुम्हीं में प्राण आर्त्त अनुरागे।”
“पर मुझे प्रयोजन अभी अनुज, इस तन का।”
“तो भार उतारो तात, तनिक इस जन का।
तुम निज विनोद में व्यथा छिपा सकते हो,
करके इतना आयास नहीं थकते हो।
पर मैं कैसे, किस लिए, सहूँ यह इतना?”
“मुझ जैसे मेरे लिए तुम्हें यह कितना?
शिष्टागम निष्फल नहीं कहीं होता है,
वन में भी नागर-भाव बीज बोता है।
कुछ देख रही है दूर दृष्टि-मति मेरी,
क्या तुम्हें इष्ट है वीर, विफल-गति मेरी?
तुमने मेरा आदेश सदा से माना,
हे तात, कहो क्यों आज व्यर्थ हठ ठाना?
करने में निज कर्त्तव्य कुयश भी यश है।”
“हे आर्य, तुम्हारा भरत अतीव अवश है।
क्या कहूँ और क्या करूँ कि मैं पथ पाऊँ?
क्षण भर ठहरो, मैं ठगा न सहसा जाऊँ।”

सन्नाटा-सा छा गया सभा में क्षण भर,
हिल सका न मानों स्वयं काल भी कण भर।
जावालि जरठ को हुआ मौन दुःसह-सा,
बोले वे स्वजटिल शीर्ष डुला कर सहसा-
“ओहो! मुझको कुछ नहीं समझ पड़ता है,
देने को उलटा राज्य द्वन्द्व लड़ता है।
पितृ-वध तक उसके लिए लोग करते हैं।”
“हे मुने, राज्य पर वही मर्त्य मरते हैं।”
“हे राम, त्याग की वस्तु नहीं वह ऐसी।”
“पर मुने, भोग की भी न समझिए वैसी।”
“हे तरुण, तुम्हें संकोच और भय किसका?”
“हे जरठ, नहीं इस समय आपको जिसका!”
“पशु-पक्षी तक हे वीर, स्वार्थ-लक्षी हैं।”
“हे धीर, किन्तु मैं पशु न आप पक्षी हैं!”
“मत की स्वतन्त्रता विशेषता आर्यों की,
निज मत के ही अनुसार क्रिया कार्यों की।
हे वत्स, विफल परलोक-दृष्टि निज रोको।”
“पर यही लोक हे तात, आप अवलोको।”
“यह भी विनश्य है, इसीलिए हूँ कहता।”
“क्या?-हम रहते, या राज्य हमारा रहता?”
“मैं कहता हूँ-सब भस्मशेष जब लोगो,
तब दुःख छोड़ कर क्यों न सौख्य ही भोगो?”
“पर सौख्य कहाँ है, मुने, आप बतलावें?”
“जनसाधारण ही जहाँ मानते आवें।”
“पर साधारण जन आप न हमको जानें,
जनसाधारण के लिए भले ही मानें।”
“यह भावुकता है।” “हमें इसी में सुख है;
फिर पर-सुख में क्यों चारुवाक्य, यह दुख है?”
तब वामदेव ने कहा-“धन्य भावुकता,
कर सकता उसका मूल्य कौन है चुकता?
भावुक जन से ही महत्कार्य होते हैं,
ज्ञानी संसार असार मान रोते हैं।”
“किन से विवाद हे आर्य, आप करते हैं?”
बोले लक्ष्मण-“ये सौख्य खोज मरते हैं!
सुख मिले जहाँ पर जिन्हें, स्वाद वे चक्खें,
पर औरों का भी ध्यान कृपा कर रक्खें।
शासन सब पर है, इसे न कोई भूले,-
शासक पर भी, वह भी न फूल कर ऊले।”

हँस कर जावालि वशष्टि ओर तब हेरे,
मुसका कर गुरु ने कहा-“शिष्य हैं मेरे!
मन चाहे जैसे, और परीक्षा लीजे,
आवश्यक हो तो स्वयं स्वदीक्षा दीजे।”
प्रभु बोले-“शिक्षा वस्तु सदैव अधूरी,
हे भरतभद्र, हो बात तुम्हारी पूरी।”

“हे देव, विफल हो वार वार भी, मन की,-
आशा अटकी है अभी यहाँ इस जन की।
जब तक पितुराज्ञा आर्य यहाँ पर पालें,
तब तक आर्या ही चलें,-स्वराज्य सँभालें।”
“भाई, अच्छा प्रस्ताव और क्या इससे?
हमको-तुमको सन्तोष सभी को जिससे।”
“पर मुझको भी हो तब न?” मैथिली बोलीं-
कुछ हुईं कुटिल-सी सरल दृष्टियाँ भोलीं।
“कह चुके अभी मुनि-’सभी स्वार्थ ही देखें।’
अपने मत में वे यहाँ मुझी को लेखें!”

“भाभी, तुम पर है मुझे भरोसा दूना,
तुम पूर्ण करो निज भरत-मातृ-पद ऊना।
जो कोसलेश्वरी हाय! वेश ये उनके?
मण्डन हैं अथवा चिन्ह शेष ये उनके?”
“देवर, न रुलाओ आह, मुझे रोकर यों,
कातर होते हो तात, पुरुष होकर यों?
स्वयमेव राज्य का मूल्य जानते हो तुम,
क्यों उसी धूल में मुझे सानते हो तुम?
मेरा मण्डन सिन्दूर-बिन्दु यह देखो,
सौ सौ रत्नों से इसे अधिक तुम लेखो।
शत चन्द्र-हार उस एक अरुण के आगे
कब स्वयं प्रकृति ने नहीं स्वयं ही त्यागे?
इस निज सुहाग की सुप्रभात वेला में,
जाग्रत जीवन की खण्डमयी खेला में,
मैं अम्बा-सम आशीष तुम्हें दूँ, आओ,
निज अग्रज से भी शुभ्र सुयश तुम पाओ!”
“मैं अनुगृहीत हूँ, अधिक कहूँ क्या देवी,
निज जन्म जन्म में रहूँ सदा पद-सेवी।
हे यशस्विनी, तुम मुझे मान्य हो यश से,
पर लगें न मेरे वचन तुम्हें कर्कश-से।

तुमने मुझको यश दिया स्वयं श्रीमुख से,
सुख-दान करें अब आर्य बचा कर दुख से।
हे राघवेन्द्र, यह दास सदा अनुयायी,
है बड़ी दण्ड से दया अन्त में न्यायी!”
“क्या कुछ दिन तक भी राज्य भार है भाई?
सब जाग रहे हैं, अर्द्ध रात्रि हो आई।”
“हे देव, भार के लिए नहीं रोता हूँ,
इन चरणों पर ही मैं अधीर होता हूँ।
प्रिय रहा तुम्हें यह दयाघृष्टलक्षण तो,
कर लेंगी प्रभु-पादुका राज्य-रक्षण तो।
तो जैसी आज्ञा, आर्य सुखी हों वन में,
जूझेगा दुख से दास उदास भवन में।
बस, मिलें पादुका मुझे, उन्हें ले जाऊँ,
बच उनके बल पर, अवधि-पार मैं पाऊँ।
हो जाय अवधि-मय अवध अयोध्या अब से,
मुख खोल नाथ, कुछ बोल सकूँ मैं सब से।”
“रे भाई, तूने रुला दिया मुझको भी,
शंका थी तुझसे यही अपूर्व अलोभी!
था यही अभीप्सित तुझे अरे अनुरागी,
तेरी आर्या के वचन सिद्ध हैं त्यागी!”

“अभिषेक अम्बु हो कहाँ अधिष्ठित, कहिए,
उसकी इच्छा है-यहीं तीर्थ बन रहिए।
हम सब भी करलें तनिक तपोवन-यात्रा।”
“जैसी इच्छा, पर रहे नियत ही मात्रा।”

तब सबने जय जयकार किया मनमाना,
वंचित होना भी श्लाघ्य भरत का जाना।
पाया अपूर्व विश्राम साँस-सी लेकर,
गिरि ने सेवा की शुद्ध अनिल-जल देकर।
मूँदे अनन्त ने नयन धार वह झाँकी,
शशि खिसक गया निश्चिन्त हँसी हँस बाँकी।
द्विज चहक उठे, होगया नया उजियाला,
हाटक-पट पहने दीख पड़ी गिरिमाला।
सिन्दूर-चढ़ा आदर्श-दिनेश उदित था,
जन जन अपने को आप निहार मुदित था।
सुख लूट रहे थे अतिथि विचर कर, गाकर-
’हम धन्य हुए इस पुण्यभूमि पर आकर।’

इस भाँति जनों के मनोंमुकुल खिलते थे,
नव नव मुनि-दर्शन, प्रकृति-दृश्य मिलते थे।
गुरु-जन-समीप थे एक समय जब राघव,
लक्ष्मण से बोली जनकसुता साऽलाघव-
हे तात, तालसम्पुटक तनिक ले लेना,
बहनों को वन-उपहार मुझे है देना।
“जो आज्ञा”-लक्ष्मण गये तुरन्त कुटी में;
ज्यों घुसे सूर्य-कर-निकर सरोज-पुटी में।
जाकर परन्तु जो वहाँ उन्होंने देखा,
तो दीख पड़ी कोणस्थ उर्मिला-रेखा।
यह काया है या शेष उसी की छाया,
क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया!

“मेरे उपवन के हरिण, आज वनचारी,
मैं बाँध न लूँगी तुम्हें; तजो भय भारी।”
गिर पड़े दौड़ सौमित्रि प्रिया-पद-तल में;
वह भींग उठी प्रिय-चरण धरे दृग-जल में।

“वन में तनिक तपस्या करके
बनने दो मुझको निज योग्य,
भाभी की भगिनी, तुम मेरे
अर्थ नहीं केवल उपभोग्य।”
“हा स्वामी! कहना था क्या क्या,
कह न सकी, कर्मों का दोष!
पर जिसमें सन्तोष तुम्हें हो
मुझे उसी में है सन्तोष।”

एक घड़ी भी बीत न पाई,
बाहर से कुछ वाणी आई।
सीता कहती थीं कि-“अरे रे,
आ पहुँचे पितृपद भी मेरे!”

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