अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz part 1

अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz part 1

दूर जाकर करीब हो जितने
हमसे कब तुम करीब थे इतने
अब न आओगे तुम न जाओगे
वस्लो-हज़रां बहम हुए कितने

बेरूत, १९७८

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लब बन्द हैं साकी, मिरी आंखों को पिला दे
वो जाम जो मिन्नतकशे-सहबा नहीं होता

१९२८

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इक सुख़न मुतरिबे-ज़ेबा कि सुलग उट्ठे बदन
इक कदा साकी-ए-महवश जो करे होश तमाम
ज़िकरे-सब है कि रुख़े-यार से रंगीं था चमन
यादे-शबहा कि तने-यार था आग़ोश तमाम

जून, १९७०

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मैं दिलफ़िगार नहीं तू सितम शआर नहीं
बहुत दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं
तेरा ही अक़्स है इन अजनबी बहारों में
जो तेरे लब, तेरे बाज़ू, तेरा कनार नहीं

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मक़तल में ना मसजिद में ना ख़राबात में कोई
हम किस की अमानत में ग़मे-कारे-जहां दें
शायद कोई उनमें से कफ़न फाड़ के निकले
अब जायें, शहीदों के मज़ारों पे अज़ां दें

बेरूत, १९७९

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रफ़ीके-राह थी मंज़िल हर इक तलाश के बाद
छुटा ये साथ तो रह की तलाश भी न रही
मलूल था दिले-आईना हर ख़राश के बाद
जो पाश-पाश हुआ इक ख़राश भी न रही

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शायद कभी अफ़शा हो निगाहों पे तुम्हारी
हर सादा वरक जो सुख़ने-कुशता से ख़ूं है
शायद कभी उस गीत का परचम हो सर-अफ़राज़
जो आमदे-सरसर की तमन्ना में निगूं है
शायद कभी उस दिल की कोई रग तुम्हें चुभ जाये
जो संगे-सरे-राह की मानिन्द ज़ुबूं है

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जो पैरहन में कोई तार मुहतसिब से बचा
दराज़ दस्त्या-ए-पीरे-मुग़ां की नज़र हुआ
अगर जराहते-कातिल से बख़शवा लाये
तो दिल सियासते-चारागरां की नज़र हुआ

मार्च, १९७१

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हज़ार दर्द शबे-आरज़ू की राह में हैं
कोई ठिकाना बतायो कि काफ़िला उतरे
करीब और भी आओ कि शौके-दीद मिटे
शराब और पिलायो कि कुछ नशा उतरे

जनवरी, १९७२

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बाकी है कोई साथ तो बस एक उसी का
पहलू में लिये फिरते हैं जो दर्द किसी का
इक उमर से इस धुन में कि उभरे कोई ख़ुरशीद
बैठे हैं सहारा लिये शम्मए-सहरी का

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अपने इनआमे हुस्न के बदले
हम तहीदामनों से क्या लेना
आज फ़ुरकतज़दों पे लुत्फ़ करो
फिर कभी सबर आज़मा लेना

बेरूत, १९८२

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देस-परदेस के याराने-कदहख़्वार के नाम
हुस्ने-आफ़ाक जमाले-लबो-रुख़सार के नाम

दस्ते-तहे-संग का समर्पण

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शाम धुंधलाने लगी और मिरी तनहाई
दिल में पत्थर की तरह बैठ गई
चांद उभरने लगा यकबार तिरी याद के साथ
ज़िन्दगी मूनिसो ग़मख़्वार नज़र आने लगी

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हम अपने वक़्त में गुज़रे जहाने-गुज़रां से
नज़र में रात लिये दिल में आफ़ताब लिये
हम अपने वक़्त पे पहुंचे हुज़ूरे-यज़दां में
ज़बां पे हमद लिये हाथ में शराब लिये

बेरूत, १९८१

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