अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz Part 3

अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz Part 3

तमाम शब दिले-वहशी तलाश करता है
हर इक सदा में तिरे हर्फ़े-लुत्फ़ का आहंग
हर इक सुबह मिलाती है बार-बार नज़र
तिरे दहन से हर इक लाला-ओ-गुलाब का रंग

मार्च, १९५६

—————————————-

तुम्हारे हुस्न से रहती है हमकिनार नज़र
तुम्हारी याद से दिल हमकलाम रहता है
रही फ़राग़ते-हज़रां तो हो रहेगा तय
तुम्हारी चाह का जो-जो मुकाम रहता है

हैदराबाद जेल, १९५१

—————————————-

खिले जो एक दरीचे में आज हुस्न के फूल,
तो सुबह झूम के गुलज़ार हो गई यकसर
जहां कहीं भी गिरा नूर उन निगाहों से
हर इक चीज़ तरहदार हो गई यकसर

जिनाह असपताल, कराची

—————————————-

रात ढलने लगी है सीनों में
आग सुलगायो आबगीनों में
दिले-उशाक की ख़बर लेना
फूल खिलते हैं इन महीनों में

मार्च, १९५७

—————————————-

येह ख़ूं की महक है कि लबे-यार की ख़ुशबू
किस राह की जानिब से सदा आती है देखो
गुलशन में बहार आई, कि ज़िन्दां हुआ आबाद
किस सिमत से नग़मों की सदा आती है देखो

फरवरी, १९५७

—————————————-

आज तनहाई किसी हमदमे-दैरीं की तरह
करने आई है मेरी साकीगरी शाम ढले
मुंतज़िर बैठे हैं हम दोनों कि महताब उभरे
और तेरा अक़्स झलकने लगे हर साये तले

अप्रैल, १९५७

—————————————-

न दीद है न सुख़न, अब न हर्फ़ है न प्याम
कोई भी हीला-ए-तसकीं नहीं और आस बहुत है
उम्मीदे-यार, नज़र का मिज़ाज, दर्द का रंग
तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है

जनवरी, १९५८

—————————————-

हम खसतातनों से मुहतसिबो क्या माल मनाल का पूछते हो
जो उमर से हमने भर पाया सब सामने लाये देते हैं
दामन में है मुश्ते-ख़ाके-जिगर, साग़र में है ख़ूने-हसरते-मय
लो हमने दामन थाम लिया, लो जाम उलटाये देते हैं

किला लाहौर, मार्च, १९५९

—————————————-

आ गई फ़सले-सुकूं चाक गरेबां-वालो
सिल गए होंठ, कोई ज़ख़्म सिले या न सिले
दोस्तो बज़्म सजायो कि बहार आई है
खिल गए ज़ख़्म, कोई फूल खिले या न खिले

अप्रैल, १९५९

—————————————-

ढलती है मौजे-मय की तरह रात इन दिनों
खिलती है सुबहे-गुल की तरह रंगो-बू से पुर
वीरां है जाम, पास करो कुछ बहार का
दिल आरज़ू से पुर करो, आंखें लहू से पुर

फरवरी, १९५९

—————————————-

इन दिनों रस्मो-रहे-शहरे-निगारां क्या है
कासिदा, कीमते-गुलगशते-बहारां क्या है
कू-ए-जानां है, कि मक़तल है, कि मयख़ाना है
आजकल सूरते-बरबादी-ए-यारां क्या है

जून, १९६८

—————————————-

अदा-ए-हुस्न की मासूमीयत को कम कर दे
गुनाहगार नज़र को हिजाब आता है

ज़िन्दां-ज़िन्दां शोरे-अनल-हक, महफ़िल-महफ़िल कुलकुले-मय
ख़ूने-तमन्ना दरिया-दरिया, दरिया-दरिया ऐश की लहर
दामन-दामन रुत फूलों की, आंचल-आंचल अश्कों की
करीया-करीया जशन बपा है, मातम-मातम शहर-ब-शहर

कराची, जनवरी, १९६५

—————————————-

दीदा-ए-तर पे वहां कौन नज़र करता है
कासा-ए-चश्म में ख़ूं-नाबे-जिगर ले के चलो
अब अगर जायो पये-अरज़ो-तलब उनके हुज़ूर
दस्तो-कशकोल नहीं कासा-ए-सर ले के चलो

कराची, जनवरी, १९६५

—————————————-

दीवार-ए-शब और अक़्से-रुख़े-यार सामने
फिर दिल के आईने से लहू फूटने लगा
फिर वज़ए-एहत्यात से धुंधला गई नज़र
फिर जबते-आरज़ू से बदन टूटने लगा

जून, १९६६

—————————————-

इक सुख़न मुतरिबे-ज़ेबा कि सुलग उट्ठे बदन
इक कदा साकी-ए-महवश जो करे होश तमाम
ज़िकरे-सब है कि रुख़े-यार से रंगीं था चमन
यादे-शबहा कि तने-यार था आग़ोश तमाम

जून, १९७०

—————————————-

मैं दिलफ़िगार नहीं तू सितम शआर नहीं
बहुत दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं
तेरा ही अक़्स है इन अजनबी बहारों में
जो तेरे लब, तेरे बाज़ू, तेरा कनार नहीं

 

Leave a Reply