अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz Part 2

अश्यार-ओ-क़तात-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz Part 2

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दिल रहीने-ग़मे-जहां है आज
हर नफ़स तशना-ए-फ़ुग़ां है आज
सख़्त वीरां है महफ़िले-हसती
ऐ ग़मे-दोस्त तू कहां है आज

मार्च, १९३०

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रात यूं दिल में तिरी खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाये
जैसे सहरायों में चले हौले से बादे-नसीम
जैसे बीमार को बे-वजह करार आ जाये

जुलाई, १९२९

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वक़्फ़े-हरमानो-यास रहता है
दिल है अक़्सर उदास रहता है
तुम तो ग़म दे के भूल जाते हो
मुझ को एहसां का पास रहता है

जून, १९३१

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सबा के हात में नरमी है उनके हातों की
ठहर-ठहर के ये होता है आज दिल को गुमां
वो हाथ ढूंढ रहे हैं बिसाते-महफ़िल में
कि दिल के दाग़ कहां हैं, नशिसते-दर्द कहां

अगसत, १९५९

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मता-ए-लौह-ओ-कल्म छिन गई तो क्या ग़म है
कि ख़ूने दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने
ज़बां पे मुहर लगी है तो क्या कि रख दी है
हर इक हल्का-ए-ज़ंज़ीर में ज़ुबां मैंने

सितम्बर, १९५२

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न पूछ जब से तिरा इंतज़ार कितना है
कि जिन दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं
तिरा ही अक़्स है उन अजनबी बहारों में
जो तेरे लब, तिरे बाजू, तेरा कनार नहीं

जून, १९५०

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फिर हशर के सामां हुए ऐवान-ए-हवस में
बैठे हैं ज़विल-अदल गुनहगार खड़े हैं
हां, जुर्मे-वफ़ा देखिये किस किस पे है साबित
वोह सारे ख़ताकार सरे-दार खड़े हैं

मई, १९५१

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तेरा जमाल निगाहों में ले के उट्ठा हूं
निखर गई है फ़ज़ा तेरे पैरहन की-सी
नसीम तेरे शबिसतां से हो के आई है
मेरी सहर में महक है तेरे बदन की-सी

जून, १९५१

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हमारे दम से है कू-ए-जुनूं में अब भी ख़जल
अबा-ए-शेख़-ओ-कबा-ए-अमीर-ओ-ताज-ए-शही
हमीं से सुन्नते-मंसूरो-कैस ज़िन्दा है
हमें से बाकी है गुलदामनी-ओ-कजकुलही

नवम्बर, १९५१

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फ़िक्रे-सूद-ओ-ज़ियां तो छूटेगी
मिन्नते-ईं-ओ-आं तो छूटेगी
ख़ैर, दोज़ख में मय मिले न मिले
शैख़ साहब से जां तो छूटेगी

मई, १९५४

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फ़ज़ा-ए-दिल पे उदासी बिखरती जाती है
फ़सुरदगी है कि जां तक उतरती जाती है
फ़रेबे-जीसत से कुदरत का मुद्दआ मालूम
येह होश है कि जवानी गुज़रती जाती है

जनवरी, १९३३

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सुबह फूटी तो आसमां पे तिरे
रंगे-रुख़सार की फोहार गिरी
रात छाई तो रू-ए-आलम पर
तेरी ज़ुल्फ़ों की आबशार गिरी

जनवरी, १९५५

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मयख़ानों की रौनक हैं, कभी ख़ानकहों की
अपना ली हवसवालों ने जो रसम चली है
दिलदारी-ए-वायज़ को हमीं बाकी हैं वरना
अब शहर में हर रिन्दे-ख़राबात वली है

जुलाई, १९५७

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ना आज लुत्फ़ कर इतना कि गुज़र न सके
वोह रात जो कि तेरे गेसुयों की रात नहीं
ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम
विसाले-यार फ़क़्त आरज़ू की बात नहीं

नवम्बर, १९५३

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