अशक्त-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

अशक्त-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

क्या हमारे भाव शब्दातीत हैं ?
या तुम्हारा रुप भावातीत है ?
हम न गा सकते तुम्हारा गीत हैं
वह हृदय गम्भीर, नीरव सिक्त है !

यह विशद जीवन कि जो आकाश-सा
या कि निर्झर-सा चपल लघु तीव्र है,
क्या पूर्ण है ? क्या तृप्ति पाता शीघ्र है,
वह ग्रीष्म-सा है या मदिर मधुमास-सा ?

हम लिखें कविता विरह पर, दु:ख पर
या मधुर आराधना पर, युद्ध पर;
या रचें विज्ञान जीवन के बने-
प्रश्नमय जो अंग सन्तत क्रुद्ध पर ?

खींच लें हम चित्र जीवन में बहे
रम्य मिश्रित रंग-धारा के नवल,
चकित हो लें, उल्लसित हो लें कभी
दुख ढो लें, तत्व-चिन्ता कर सकल

किन्तु यह सब तो सतह की चीज़ है,
भार बन मेरे हृदय पर छा रही ।
या कि बहते सरित के ऊपर तहें
बर्फ़ की जमती चली ही जा रहीं ।

पान्थ है प्यासा, थका-सा धूप में
पीठ पर है ज्ञान की गठरी बड़ी,
झुक रही है पीठ, बढ़ता बोझ है
यह रही बेगार की यात्रा कड़ी ।

अर्थ-खोजी प्राण ये उद्दाम हैं,
अर्थ क्या ? यह प्रश्न जीवन का अमर
क्या तृषा मेरी बुझेगी इस तरह ?
अर्थ क्या ? ललकार मेरी है प्रखर ।

जब कि ऐसा ज्ञान मेरे प्राण में
तृप्ति-मधु उत्पन्न करता ही नहीं,
जब कि जीवन में मधुर सम्पन्नता,
ताज़गी, विश्वास आता ही नहीं;

जब कि शंकाकुल तृषित मन खोजता
बाहरी मरु में अमल जल-स्रोत है,
क्यों न विद्रोही बनें ये प्राण जो
सतत अन्वेषी सदा प्रद्योत हैं ?

जब कि अन्दर खोखलापन कीट-सा
है सतत घर कर रहा आराम से,
क्यों न जीवन का बृहद् अश्वत्थ यह
डर चले तूफ़ान के ही नाम से !

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