अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 7

अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 7

वासना-समासीना, महती जगती दीना

वासना-समासीना,
महती जगती दीना।

जलद-पयोधर-भारा,
रवि-शशि-तारक-हारा,
व्योम-मुखच्छबिसारा
शतधारा पथ-हीना।

ॠषिकुल-कल-कण्ठस्तुति,
दिव्य-शस्य-सकलाहुति,
निगमागम-शास्त्रश्रुति
रासभ-वासव-वीणा।

ये दुख के दिन काटे हैं जिसने

ये दुख के दिन
काटे हैं जिसने
गिन गिनकर
पल-छिन, तिन-तिन।

आँसू की लड़ के मोती के
हार पिरोये,
गले डालकर प्रियतम के
लखने को शशिमुख
दुःखनिशा में
उज्ज्वल अमलिन।

हार तुमसे बनी है जय

हार तुमसे बनी है जय,
जीत की जो चक्षु में क्षय।

विषम कम्पन बली के उर,
सदुन्मोचन छली के पुर,
कामिनी के अकल नूपुर,
भामिनी के हृदय में भय।

रच गये जो अधर अनरुण,
बच गये जो विरह-सकरुण,
अनसुने जो सच गये सुन,
जो न पाया, मिला आशय।

क्षणिकता चिर-धनिक की है,
पणिकता जग-वणिक की है,
राशि जैसे कणिक की है,
वाम जैसे है निरामय।

अट नहीं रही है

अट नहीं रही है
आभा फागुन की तन
सट नहीं रही है।

कहीं साँस लेते हो,
घर-घर भर देते हो,
उड़ने को नभ में तुम
पर-पर कर देते हो,
आँख हटाता हूँ तो
हट नहीं रही है।

पत्‍तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल,
कहीं पड़ी है उर में,
मंद – गंध-पुष्‍प माल,
पाट-पाट शोभा-श्री
पट नहीं रही है।

कुंज-कुंज कोयल बोली है

कुंज-कुंज कोयल बोली है,
स्वर की मादकता घोली है।

कांपा है घन पल्लव-कानन,
गूँजी गुहा श्रवण-उन्मादन,
तने सहज छादन-आच्छादन,
नस ने रस-वशता तोली है।

गृह-वन जरा-मरण से जीकर
प्राणों का आसव पी-पीकर
झरे पराग-गन्ध-मधु-शीकर,
सुरभित पल्लव की चोली है।

तारक-तनु रवि के कर सिंचित,
नियमित अभिसारक जीवित सित,
आमद-पद-भर मंजु-गुंजरित
अलिका की कलिका डोली है।

कौन गुमान करो जिन्दगी का

कौन गुमान करो जिन्दगी का?
जो कुछ है कुल मान उन्हीं का।

बाँधे हुए घर-बार तुम्हारे,
माथे है नील का टीका,
दाग़-दाग़ कुल अंग स्याह हैं
रंग रहा है फीका–
तुम्हारा कोई न जी का।

एक भरोसा, एक सहारा,
वारा-न्यारा बन्दगी का,
ज्ञान गठा कब, मान हुआ कब,
ध्यान गया जब पी का,
बना कब आन किसीका?

छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े

छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े,
कब बसे तुम्हारे खेड़े?

यह राह तुम्हारी कब की
जिसको समझे हम सब की?
गम खा जाते हैं अब की,
तुम ख़बर करो इस ढब की,
हम नहीं हाथ के पेड़े।

सब जन आते जाते हैं,
हँसते हैं, बतलाते हैं,
आपस में इठलाते हैं,
अपना मन बहलाते हैं,
तुमको खेने हैं बेड़े।

 प्रिय के हाथ लगाये जागी

प्रिय के हाथ लगाये जागी,
ऐसी मैं सो गई अभागी।

हरसिंगार के फूल झर गये,
कनक रश्मि से द्वार भर गये,
चिड़ियों के कल कण्ठ मर गये,
भस्म रमाकर चला विरागी।

शिशु गण अपने पाठ हुए रत,
गृही निपुण गृह के कर्मों नत,
गृहिणी स्नान-ध्यान को उद्यत,
भिक्षुक ने घर भिक्षा माँगी।

चलीं निशि में तुम आई प्रात

चलीं निशि में तुम आई प्रात;
नवल वीक्षण, नवकर सम्पात,

नूपुर के निक्वण कूजे खग,
हिले हीरकाभरण, पुष्प मग,
साँस समीरण, पुलकाकुल जग,
हिले पग जलजात।

लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां

लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां;
गूँजी अलियों की आवलियाँ।

तरियों की परियाँ हैं जल पर,
गाती हैं खग-कुल-कल-कल-स्वर,
तिरती हैं सुख-सुकर पंख-भर,
रूम घूमकर सुघर मछलियाँ।

जल-थल-नभ आनन्द-भास है,
किसी विश्वमय का विकास है,
सलिल-अनिल ऊर्मिल विलास है,
निस्तल गीति-प्रीति की तलियाँ।

परिचय से संचित सारा जग,
राग-राग से जीवन जगमग,
सुख के उठते हैं पुलकित डग,
रह जाती हैं अपल पुतलियाँ।

 

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