अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 5

अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 5

सुरतरु वर शाखा

सुरतरु वर शाखा
खिली पुष्प-भाषा।

मीलित नयनों जपकर
तन से क्षण-क्षण तपकर
तनु के अनुताप प्रखर,
पूरी अभिलाषा।

बरसे नव वारिद वर,
द्रुम पल्लव-कलि-फलभर
आनत हैं अवनी पर
जैसी तुम आशा।

भावों के दल, ध्वनि, रस
भरे अधर-अधर सुवश,
उघरे, उर-मधुर परस,
हँसी केश-पाशा।

वेदना बनी मेरी अवनी

वेदना बनी;
मेरी अवनी।

कठिन-कठिन हुए मृदुल
पद-कमल विपद संकल
भूमि हुई शयन-तुमुल
कण्टकों घनी।

तुमने जो गही बांह,
वारिद की हुई छांह,
नारी से हुईं नाह,
सुकृत जीवनी।

पार करो यह सागर
दीन के लिए दुस्तर,
करुणामयि, गहकर कर,
ज्योतिर्धमनी।

आंख बचाते हो तो क्या आते हो

आँख बचाते हो
तो क्या आते हो?

काम हमारा बिगड़ गया
देखा रूप जब कभी नया;
कहाँ तुम्हारी महा दया?
क्या क्या समझाते हो?–
आँख बचाते हो।

लीक छोड़कर कहाँ चलूं?
दाने के बिना क्या तलूं?
फूला जब नहीं क्या फलूं?
क्या हाथ बटाते हो?–
आँख बचाते हो।

हरि का मन से गुणगान करो

हरि का मन से गुणगान करो,
तुम और गुमान करो, न करो।
स्वर-गंगा का जल पान करो,
तुम अन्य विधान करो, न करो।

निशिवासर ईश्वर ध्यान करो,
तुम अन्य विमान करो, न करो।
ठग को जग-जीवन-दान करो,
तुम अन्य प्रदान करो, न करो।

दुख की निशि का अवसान करो,
उपमा, उपमान करो, न करो।
प्रिय नाह की बांह का थान करो,
तुम और वितान करो, न करो।

खुल कर गिरती है

खुल कर गिरती है
जो, उड़ती फिरती है।

ऐसी ही एक बात चलती है,
घात खड़ी-खड़ी हाथ मलती है,
तभी सह-सही दाल गलती है
(जो)तिरती-तिरती है।

काम इशारा नहीं आया तो
जैसी माया हो, छाया हो।
मुसकाया, मन को भाया जो,
उससे सिरती है।

विगलित जो हुआ दाप से दर
प्राणों को मिला शाप से वर;
गिरि के उर से मृदु-मन्द्र-स्वर,
सरिता झिरती है।

तन, मन, धन वारे हैं

तन, मन, धन वारे हैं;

परम-रमण, पाप-शमन,
स्थावर-जंगम-जीवन;
उद्दीपन, सन्दीपन,
सुनयन रतनारे हैं।

उनके वर रहे अमर
स्वर्ग-धरा पर संचर,
अक्षर-अक्षर अक्षर,
असुर अमित मारे हैं।

दूर हुआ दुरित, दोष,
गूंज है विजय-घोष,
भक्तों के आशुतोष,
नभ-नभ के तारे हैं।

 वे कह जो गये कल आने को

वे कह जो गये कल आने को,
सखि, बीत गये कितने कल्पों।
खग-पांख-मढी मृग-आँख लगी,
अनुराग जगी दुख के तल्पों।

उनकी जो रही, बस की न कही,
रस की रसना अशना न रही,
विपरीत की टेक न एक सही,
दिन बीत चले अल्पों-अल्पों।

उनकी जय उर-उर भय भसका,
उनके मग में जग-जय मसका,
उनके डग से कुल क्षय धसका,
पर दरस गये जल्पों-जल्पों।

मानव का मन शान्त करो हे

मानव का मन शान्त करो हे!
काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से
जीवन को एकान्त करो हे।

हिलें वासना-कृष्ण-तृष्ण उर,
खिलें विटप छाया-जल-सुमधुर,
गूंजे अलि-गुंजन के नूपुर,
निज-पुर-सीमा-प्रान्त करो हे।

विहग-विहग नव गगन हिला दे,
गान खुले-कण्ठ-स्वर गा दे,
नभ-नभ कानन-कानन छा दे,
ऐसे तुम निष्क्रान्त करो हे।

रूखे-मुख की रेखा सोये,
फूट-फूटकर माया रोये,
मानस-सलिल-मलिनता धोये,
प्रति मग से आक्रान्त करो हे!

तुम ही हुए रखवाल

तुम ही हुए रखवाल
तो उसका कौन न होगा?
फूली-फली तरु-डाल
तो उसका कौन न होगा?

कान पड़ी है खटाई
तो उसकी मौन मिताई,
और हिये जयमाल
तो उसका कौन न होगा?

जिसने किया है किनारा
उसीका दलबल हारा,
और हुए तुम ढाल
तो उसका कौन न होगा?

नव तन कनक-किरण फूटी है

नव तन कनक-किरण फूटी है।
दुर्जय भय-बाधा छूटी है।

प्रात धवल-कलि गात निरामय
मधु-मकरन्द-गन्ध विशदाशय,
सुमन-सुमन, वन-मन, अमरण-क्षय,
सिर पर स्वर्गाशिस टूटी है।

वन के तरु की कनक-बान की
वल्ली फैली तरुण-प्राण की,
निर्जल-तरु-उलझे वितान की
गत-युग की गाथा छूटी है।

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