अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

अर्चना -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

शिविर की शर्वरी

शिविर की शर्वरी
हिंस्र पशुओं भरी।

ऐसी दशा विश्व की विमल लोचनों
देखी, जगा त्रास, हृदय संकोचनों
कांपा कि नाची निराशा दिगम्बरी।

मातः, किरण हाथ प्रातः बढ़ाया
कि भय के हृदय से पकड़कर छुड़ाया,
चपलता पर मिली अपल थल की तरी।

आशा आशा मरे

आशा आशा मरे
लोग देश के हरे!

देख पड़ा है जहाँ,
सभी झूठ है वहाँ,
भूख-प्यास सत्य,
होंठ सूख रहे हैं अरे!

आस कहाँ से बंधे?
सांस कहाँ से सधे?
एक एक दास,
मनस्काम कहाँ से सरे?

रूप-नाम हैं नहीं,
कौन काम तो सही?
मही-गगन एक,
कौन पैर तो यहाँ धरे?

छाँह न छोड़ी

छांह न छोड़ी,
तेरे पथ से उसने आस न तोड़ी।

शाख़-शाख़ पर सुमन खिले,
हवा-हवा से हिले मिले,
उर-उर फिर से भरे, छिले,
लेकिन उसने सुषमे, आंख न मोडी।

कहीं आव, कहीं है दुराव,
कहीं बढ़े चलने का चाव,
पाप-ताप लेने का दाव
कहीं बढ़े-बढ़े हाथ घात निगोड़ी।

साधो मग डगमग पग

साधो मग डगमग पग,
तमस्तरण जागे जग।

शाप-शयन सो-सोकर,
हुए शीर्ण खो-खोकर,
अनवलाप रो-रोकर
हुए चपल छलकर ठग।

खोलो जीवन बन्धन,
तोलो अनमोल नयन,
प्राणों के पथ पावन,
रँगो रेणु के रँग रग।

सोईं अँखियाँ

सोईं अँखियाँ:
तुम्हें खोजकर बाहर,
हारीं सखियाँ।

तिमिरवरण हुईं इसलिये
पलकों के द्वार दे दिये
अन्तर में अकपट
हैं बाहर पखियाँ।

प्रार्थना, प्रभाती जैसी,
खुलें तुम्हारे लिये वैसी,
भरें सरस दर्शन से
ये कमरखियाँ।

तिमिरदारण मिहिर दरसो

तिमिरदारण मिहिर दरसो।
ज्योति के कर अन्ध कारा-
गार जग का सजग परसो।

खो गया जीवन हमारा,
अन्धता से गत सहारा;
गात के सम्पात पर उत्थान
देकर प्राण बरसो।

क्षिप्रतर हो गति हमारी,
खुले प्रति-कलि-कुसुम-क्यारी,
सहज सौरभ से समीरण पर
सहस्रों किरण हरसों।

तुम जो सुथरे पथ उतरे हो

तुम जो सुथरे पथ उतरे हो,
सुमन खिले, पराग बिखरे, ओ!

ज्योतिश्छाय केश-मुख वाली,
तरुणी की सकरुण कलिका ली,
अधर-उरोज-सरोज-वनाली,
अश्रु-ओस की भेंट भरे हो।

पवन-मन्द-मृदु-गन्ध प्रवाहित,
मधु-मकरन्द, सुमन-सर-गाहित,
छन्द-छन्द सरि-तरि उत्साहित,
अवनि-अनिल-अम्बर संवरे हो।

स्वर्ण-रेणु के उदयाचल-रवि,
दुपहर के खरतर ज्योतिशछवि,
हे उर-उर के मुखर-मधुर कवि,
निःस्व विश्व को तुम्हीं वरे हो।

जिनकी नहीं मानी कान

जिनकी नहीं मानी कान
रही उनकी भी जी की।

जोबन की आन-बान
तभी दुनिया की फीकी।
राह कभी नहीं भूली तुम्हारी,
आँख से आँख की खाई कटारी,
छोड़ी जो बाँधी अटारी-अटारी
नई रोशनी, नई तान;
रही उनकी भी जी की,
जिनकी नहीं मानी कान।

दीप जलता रहा

दीप जलता रहा,
हवा चलती रही;
नीर पलता रहा,
बर्फ गलती रही।

जिस तरह आग
वन में लगी हुई है,–
एकता में सरस
भास है–दुई है,–
सत्य में भ्रम हुआ है,–
छुईमुई है,
मान बढ़ता रहा,
उम्र ढलती रही।

समय की बाट पर,
हाट जैसे लगी,–
मोल चलता रहा,
झोल जैसे दगी,–
पलक दल रुक गये,
आँख जैसे लगी,–
काल खुलता रहा

आंख लगाई

आंख लगाई
तुमसे जब से हमने चैन न पाई।

छल जो, प्राणों का सम्बल हुआ,
प्राणों का सम्बल निष्कल हुआ,
जंगल रमने का मंगल हुआ,
ज्योति जहाँ वहाँ अंधेरी घिर आई।

राह रही जहाँ वहाँ पन्थ न सूझा,
चाह रही जहाँ वहाँ एक न बूझा,
ऐसी तलवार चली कुनबा जूझा,
बन आई वह कि दूर हुई सगाई।

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