अमा-संध्या- रेणुका-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

अमा-संध्या- रेणुका-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

नीरव, प्रशान्त जग, तिमिर गहन।
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

किसकी किंकिणि-ध्वनि? मौन विश्व में झनक उठा किसका कंकण?
झिल्ली-स्वन? संध्या श्याम परी की हृदय-शिराओं का गुंजन?
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

अन्तिम किरणें भर गईं उर्मि-
अधरों में मोती के चुम्बन,
वन-कुसुम वृन्त पर ऊँघ रहे,
दूर्वा-मुख सींच रहे हिम-कण।
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

नीलिमा-सलिल में अमा खोल
कलिका-गुम्फित कबरी-बंधन,
लहरों पर बहती इधर-उधर
कर रही व्योम में अवगाहन।
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

मुक्ता कुंतल में गूँथ, शुक्र का
पहन कुसुम-कर्णाभूषण
दिग्वधू क्षितिज पर बजा रही
मंजीर, चपल कँप रहे चरण।
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

यह भुवन-प्राण-तंत्री का स्वन?
लघु तिमिर-वीचियों का कम्पन?
यह अमा-हृदय का क्या गुनगुन?
किस विरह-गीत का स्वर उन्मन?
रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन?

१९३३

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