अभिलाषा-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal 

अभिलाषा-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

क्या सोच रही हो गुमसुम
आओ पल भर प्यार कर लें
कुछ आँखों से कह लें अपनी
और अधरों को उन्माद से भर लें

खिली जलज सी सुन्दर चेहरे को
छू लूँ तपती होंठों के चुम्बन से
तुम्हे ह्रदय से लगा कर सुख से
कुछ पल बिता लूँ हम इस मधुवन में

तुम्हारे बालों के घनी छावं में
जब लेट कर देखूं स्वर्ग है कहाँ
सुन्दरता से तो शशि भी छिप जाये
तुमसा कामुक रतिमय कोई और नहीं यहाँ

कुछ और पास आ जाओ
खो जाएँ तुम्हारी गुनगुनाहट में
धन-यश से परे जीवन में
साथ सो जाएँ तपती कसमसाहट में

तुम्हे शब्दों में कैसे लिख सकता हूँ
तुम तो हो प्यार की पहली परिभाषा
मै अब तक तुम्हारा रस-रूप देखता ही रहा
तुम्हे फिर से पा जाऊं यही है बची अभिलाषा

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