अब नहीं-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

अब नहीं-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

अब नहीं, अब नहीं
जीवन की भेंट और अब नहीं।

देते हो तुम तो पर
धरूँ कहाँ दान,
राख है मकान
लुटी पूरी दुकान
नाव कहाँ बाँधूँ जब नदिया ही नहीं रही ।
अब नहीं, अब नहीं, अब नहीँ।।

रिसता है रिसने दो
यह अनगढ़ पात्र
बनना नहीं है मुझे
इलियट का सार्त्र
पाऊँगा जो कुछ वो खोऊँगा यहीं-कहीं।
अब नहीं, अब नहीं, अब नहीं।।

दुख ही था प्रेषक
बना दुख ही पता
कौन यहाँ समझे
यह षोडसी व्यथा
किसे कहूँ बातें जो तुमसे ही नहीं कहीं ।
अब नहीं, अब नहीं, अब नहीं।।

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