अब दुश्मन ने भेष बदला-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

अब दुश्मन ने भेष बदला-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

सरहदों की रखवाली कर रहे
हाथ और हथियार भी
बेकार होकर बैठ गए।
नए नवेले दुश्मन से पाने को त्राण
पूरी दुनिया के लोग
फ़िक्रों से घिर कर बैठ गए।

कुल आलम ने विश्वयुद्ध दो, आँखों से देखा
यह तीसरा आदमखोर विश्वयुद्ध
कौन इससे किस तरह टकरे।
बन गए सब बलि के बकरे।
अब दुश्मन ने बदला भेष।

हम तो इस अहंकार में
अब तक रहे थे खोए
हमारे हाथ में बम परमाणु।
यह रखवाला बन हमारे सिर पर
जंग-युद्ध में छतरी तानेगा
पर यह कहाँ से कौन सा दुश्मन आया
नाम कोरोना रोग विषाणु।

घर के भीतर पूरी धरती पर
अंदर बैठ कर सोच विचारो।
अंतस में अपने तनिक दृष्टि तो डालो।
अब हदों सरहदों से भी
बिना बुलाए लँघता दुश्मन।
रंग नस्ल यह देश न देखे।
रुतबा, कुर्सी, भेष न देखे।
दाब लेता है जागते सोते।
इस दुश्मन की नस्ल पहचानो
आदमजात की पीड़ा जानो।

कुल दुनिया की खै़र मनाएँ
ज्ञान और विज्ञान सहारे,
इस वैरी को मार भगाएँ।
नफ़रत की आग खेल खेल कर
आज तक किसने क्या पाया है।

 

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