अब तो ऐसा अक्सर होता है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

अब तो ऐसा अक्सर होता है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

हर शख्स यहाँ बेगाना है हर हाथ में खंजर होता है
अपने शहर की भीड़ का अब वीरान सा मंजर होता है
अपना अपना खोल है सबका घुसे हुए सब उसमें ही
झूठ फ़रेब की दुनिया में अब इन्सां पत्थर होता है
अपने अपने लोभ सभी के सबका अपना मतलब है
इस मतलब की ख़ातिर जग में जंग बराबर होता है
कैसे भला अब बच पाओगे मक्कारी के चंगुल से
अब पाँव तले है पड़ा भरोसा धोखा उपर होता है
खून बहाकर इन्सानों का मजहब हँसता रहता है
नफरत के बाजार में अब तो ऐसा अक्सर होता है
यहाँ लूट जाती है रोज मुहब्बत बेपरवाह ज़माने में
भला कहाँ अब वफा का जज्बा दिल के अंदर होता है

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