अब तो आ जाओ मेरे साजन-विकास कुमार गिरि -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vikas Kumar Giri 

अब तो आ जाओ मेरे साजन-विकास कुमार गिरि -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vikas Kumar Giri

जब घनघोर बारिश की बुँदे गिरती है मेरे आंगन में
मैं छोटे कद की लड़की, कमर तक डूब जाती हूं
बारिशो की पानी में
लाख कोशिश करती हूं अपने आप को बचाने में
फिर भी बच नहीं पाती हूं
बारिशो की पानी में
अब तो आ जाओ मेरे साजन

अब कभी नहीं रूठूंगी मेरे साजन
अब तेरे कुछ कहने से कभी ना भाग के जाउंगी दूसरे आँगन
अब ना कोई दिक्कत होगी मुझको मानाने में
अब तो आ जाओ मेरे साजन

छेड़ने लगे है मुझे गली मोह्हले के लड़के
घूरने लगे है मुझे गावँ के निकम्मे निठल्ले
कही मैं बिगड़ ना जाऊं युहीं छेडख़ानी में
अब तो आ जाओ मेरे साजन

माफ़ करदे जो गलती हो गई मुझसे नादानी में
सावन ऐसे गुजर ना जाए युहीं आनाकानी में
जुदाई अब सही ना जाए इस भरी जवानी में
अब तो आ जाओ मेरे साजन

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