अब अगली बात करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

अब अगली बात करो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

माना कि ताली एक हाथ से नहीं बजती,
पर तुम ताली नहीं, थप्पड़ मार रहे हो।
विधान के लालो लाल मुँह पर।

हम सब जानते हैं
ताली का ताल सुमेल ने निकलता है,
और थप्पड़ हैकड़ी से।

हमसे पहले कितनों के साथ तुमने
कहाँ कहाँ कौन कौन ताली बजाई है!
या थप्पड़ मारा है,
वक्त के बही पर पाई पाई का हिसाब लिखा धरा है।

मेहरबान! दोनों के खड़ाक में भी
बुनियादी अंतर है।
थप्पड़ ठाह करके एक बार ही बजता है
और ताली लगातार।

हमारे हाथ पैर बाँध कर
हमें तालियाँ बजाने के लिए न कहो।
हाथ खोलो फिर बताएँगे कैसे बजाना है?
हाल की घड़ी तुम बोल रहे हो, हम सुन रहे हैं।
वार्तालाप कहाँ है?
हमारे गुरू का उपदेश है, जब तक जीवित हो,
कुछ सुनो भी, साथ ही कहो भी
रोष न करो, उत्तर दो।
अब अगली बात करो!

 

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