अपने हाथों बजाओगे-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

अपने हाथों बजाओगे-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

सच जानो, बहुत देर हो गयी है ।
वापसी का समय बहुत पहले
बीत चुका है, सौदागरों की फेरी
घर लौट गयी है, अब गीदड़
सोचते हैं वे भेड़ियों के दल में हैं ।
सच जानो, वापसी का समय हो गया है,
मिट्टी में लौटने का क्षण आ गया-
जड़ों में लिपट कर बँध जाने का,
मिट्टी के लोंदों में हड्डियाँ बिखेर कर
अपनी सत्ता को प्राणदान देने का ।
कीचड़ को हृदय सौंप कर सोचो,
चैतन्य के खेत से धान मांगो,
लोभ छोड़ो, भय को दूर भगाओ।
सोचो तुम गाँव हो, तुम देश हो,
ग्रामीण महादेश, लक्ष ग्राम ।
मान लो कि स्वदेश विस्थापित है
भूखा है, खण्डित है, अक्षय
अमर इन कोटिजनों की वाणी पर
कान लगाओ, सुनो, कहो : मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।
तुम अँगरेज या फ्रांसीसी नहीं हो,
पश्चिम में तुम्हें नाम-धाम नहीं मिलेगा।
सच जानो, बहुत देर हो गयी है,
आज आँसुओं को वर्षा में मिला दो,
धूप में झुलस कर रात-रात जाग कर
मिट्टी और हवा से एकाकार
दग्ध हो कर बरसात में भीग कर
बीज के आवेग से स्वयं काँप कर
पृथिवी के छहों राग सुनते रहो
प्रतिदिन इस मिट्टी के जीवन में ।
तब एक दिन किसी शुभ मुहूर्त में-
वैसे तुम ने देर तो बहुत कर दी है,
नवान्न के से समारोह में
तुम घर में विश्व का मिलन करा सकोगे।
तुम व्यर्थ ही छिन्न-भिन्न मन से
काल के पीछे दौड़ रहे हो, घर लौटो,
स्वयं त्रिकाल तुम्हें बोल देंगे
तुम अपने हाथों भेरी बजाओगे।

 

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