अपने ज़िले की मिट्टी से-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Phanishwar Nath Renu

अपने ज़िले की मिट्टी से-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Phanishwar Nath Renu

कि अब तू हो गई मिट्टी सरहदी
इसी से हर सुबह कुछ पूछता हूँ
तुम्हारे पेड़ से, पत्तों से
दरिया औ’ दयारों से
सुबह की ऊंघती-सी, मदभरी ठंडी हवा से
कि बोलो! रात तो गुज़री ख़ुशी से?
कि बोलो! डर नहीं तो है किसी का?

तुम्हारी सर्द आहों पर सशंकित
सदा एकांत में मैं सूंघता हूँ
उठाकर चंद ढेले
उठाकर धूल मुट्ठी-भर
कि मिट्टी जी रही है तो!

बला से जलजला आए
बवंडर-बिजलियाँ-तूफ़ाँ हज़ारों ज़ुल्म ढाएँ
अगर ज़िंदी रही तू
फिर न परवाह है किसी की
नहीं है सिर पे गोकि ‘स्याह-टोपी’
नहीं हूँ ‘प्राण-हिन्दू’ तो हुआ क्या?
घुमाता हूँ नहीं मैं रोज़ डंडे-लाठियाँ तो!
सुनाता हूँ नहीं–
गांधी-जवाहर, पूज्यजन को गालियाँ तो!
सिर्फ़ ‘हिंदी’ रहा मैं
सिर्फ़ ज़िंदी रही तू
और हमने सब किया अब तक!

सिर्फ़ दो-चार क़तरे ‘ध्रुव’ का ताज़ा लहू ही
बड़ी फ़िरकापरस्ती फ़ौज को भी रोक लेगा
कमीनी हरक़तों को रोक लेगा
कि अब तो हो गई मिट्टी सरहदी
(इसी से डर रहा हूँ!)
कि मिट्टी मर गई पंजाब की थी
शेरे-पंजाब के प्यारे वतन की
तुम्हारे जिस्म पर पड़ने नहीं देंगे
कदम नापाक उन फितनापरस्तों का !

सजग हम हैं कि तू आबाद रह मिट्टी
हँसो तू कमल के संग रोज़ अपने प्रिय तलैयों में
सरस सरसों के खेतों में, बसंती डाल घूँघट
सदा तू मुस्कुराओ,
हरे मैदान में, खलिहान में तू मस्त इतराओ !

सजग हम हैं ही प्यारी पाक मिट्टी
कि इंक़लाबी रूह रुपौली! की अभी भी
उन्हीं ज़ज़बों में अब तक है मचलती ।

(ध्रुव=ध्रुव कुंडू सन 1942 के आंदोलन में
पूर्णियाँ में बारह वर्ष की उम्र में अंग्रेजी-फौज
की गोलियों के शिकार होकर शहीद हुए ।)
(1947)

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