अपना घर-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal 

अपना घर-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

तुम्हे पहली बार देखा
तो लगा सपने कितने दूर हैं
तुमसे कुछ कह-सुन कर समझा
कि साथ जीना कितना मधुर है

मन विचलित सा निष्प्राण हुआ
दिनों तक तुम्हे ही ढूंढ़ता रहा
शक्ति बटोर कर एक दिन
तुम्हे मैंने मेरी प्रियतमा कहा

जब तुमने शब्द स्वीकार लिया
तो मन बावला सम्हल गया
तुमसे ही फिर जीवन मिला
एक मुट्ठी से ही बन गया महल नया

तुम कल की नींव बनी
दीवारों में रंग दिया प्यार
ये घर तुम्ही ने बनाया है
तुम ही लक्ष्मी हो साकार

तुम जैसे उषा की पहली किरण
ठंडी हवा हो थकी दोपहरी की
चांदनी में खिली धवल सरोज हो
तुम हो रूप की सिन्धु गहरी सी

आओ इस रात को रोक लें
मधुभरी अधरों को भिगो लें
स्वागत है घर में इस जीवन का
बह जाना अब रक्त सा रगों में

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