अपना ख़ाका लगता हूँ-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia

अपना ख़ाका लगता हूँ-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia

अपना ख़ाका लगता हूँ
एक तमाशा लगता हूँ

आईनों को ज़ंग लगा
अब मैं कैसा लगता हूँ

अब मैं कोई शख़्स नहीं
उस का साया लगता हूँ

सारे रिश्ते तिश्ना हैं
क्या मैं दरिया लगता हूँ

उस से गले मिल कर ख़ुद को
तन्हा तन्हा लगता हूँ

ख़ुद को मैं सब आँखों में
धुँदला धुँदला लगता हूँ

मैं हर लम्हा इस घर से
जाने वाला लगता हूँ

क्या हुए वो सब लोग कि मैं
सूना सूना लगता हूँ

मस्लहत इस में क्या है मेरी
टूटा फूटा लगता हूँ

क्या तुम को इस हाल में भी
मैं दुनिया का लगता हूँ

कब का रोगी हूँ वैसे
शहर-ए-मसीहा लगता हूँ

मेरा तालू तर कर दो
सच-मुच प्यासा लगता हूँ

मुझ से कमा लो कुछ पैसे
ज़िंदा मुर्दा लगता हूँ

मैं ने सहे हैं मक्र अपने
अब बेचारा लगता हूँ

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