अन्त-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

अन्त-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

 

अन्त

उतर नाव से सिर पर रक्खी सबने भारत की वह धूल,
जिस पर प्रकृति चढ़ा रखती है रंग बिरंगे सुरभित फूल।
किया चिबुक चुम्बन समीर ने देकर हमें सुरभि उपहार,
पल्लव पाणि युक्त विटपों ने किया सहज स्वागत सत्कार ॥1॥

सोच रहा था मैं मन ही मन करूँ कौन सा अब मैं काम,
जिसमें कुलवन्ती की आत्मा पावे शान्ति और विश्राम।
सहसा हुआ विचार कि जिसने हमें नरक से लिया उबार,
पड़ी आज कल रण संकट में वह मेरी उदार सरकार ॥2॥

मेरे लिए यही अवसर है कि मैं करूँ उसका ऋण शोध,
धिक है जो उसके रिपुओं पर अब भी मुझे न आवे क्रोध।
धन यदि नहीं, न हो पर तन तो अब भी मेरा है अवशिष्ट,
उसके रहते हुए राज्य का देखूं मैं किस भाँति अनिष्ट ॥3॥

पर हल और फावड़े तक ही सीमाबद्ध रहे जो हाथ,
चला सकेंगे क्या शस्त्रों को रण में वे कौशल के साथ।
धनुर्वेद की शिक्षा पाकर बनते थे जो विश्रुत बीर,
होकर अब निःशस्त्र वही हम हुए हाय! अत्यन्त अधीर ॥4॥

कुछ हो, किन्तु कुली जीवन से रण का मरण भला है नित्य,
एक शत्रु भी मार सका मैं तो हो जाऊँगा कृतकृत्य।
कहा साथियों से तब मैंने अपना अभिप्राय तत्काल,
और कहा कि भाइयो, आओ, तोड़ें शत्रु जनों के जाल ॥5॥

ब्रिटिश राज्य के उपकारों का बदल चलो, चुका दें आज,
मरें न्याय के लिए समर में रक्खें मनुष्यता की लाज।
पन्ना जैसी माताओं ने देकर भी गोदी के लाल,
यहाँ राजकुल की रक्षा की चली न बनवीरों की चाल ॥6॥

उसी देश में जन्मे हैं हम हुए जहाँ झालापति मान,
भारत का प्रताप रखने को दिये जिन्होंने रण में प्राण।
राजभक्ति सर्वत्र हमारी रही सदा से ही विख्यात,
उसे दिखाने का शुभ अवसर यही मुझे होता है ज्ञात ॥7॥

किया साथियों के सम्मुख जो मैंने यह अपना प्रस्ताव,
जाग उठे बस सब के मन में सहसा श्रद्धा साहस भाव।
हुए सहस्रों की संख्या में सेना में प्रविष्ट हम लोग,
कृषक, कुली फिर सैनिक जीवन देखो, नये नये संयोग ॥8॥

इसी समय सरकार न्याय कर भारतीय वीरों के साथ,
उन्हें अफसरी के परवाने देने लगी बढ़ाकर हाथ।
भारतीय ही थे हम सब की सेना के संचालक वीर,
पाकर यों उत्साह हमारे पुलक पूर्ण हो उठे शरीर ॥9॥

आखिर शुभ मुहूर्त में सब ने रण के लिए किया प्रस्थान
हिलता डुलता गर्व पूर्ण सा चलने लगा प्रबल जलयान।
बीच बीच में सीतावर की करते थे सब जय जयकार,
स्वर में स्वर देकर अनन्त भी करता था उसकी गुंजार ॥10॥

यथा समय टिगरिस के तट पर उतरे हम सब डेरे डाल,
समाचार पत्रों में पढ़ना इस के आगे का सब हाल।
एक रोज अरिदल से आकर मैं अचेत हो हुआ सचेत,
‘विक्टोरिया क्रास’ छाती पर देखा मैंने शान्ति समेत ॥11॥

भारतीय कप्तान हमारे मुझे धैर्य देकर सविशेष,
पूछ रहे हैं घर कहने को अब मेरा अन्तिम सन्देश।
पाठक, क्या कहकर मैं इन से माँगूँ तुमसे बिदा सहर्ष,
और मिलूँ झट कुलवन्ती से पाकर अन्त समय उत्कर्ष ॥12॥

भारतीय मेरे बान्धव हैं, घर है मेरा सारा देश,
बस यह मेरा आत्म चरित ही है मेरा अन्तिम सन्देश।
इससे अधिक और क्या अब मैं कह सकता हूँ हे भगवान,
मेरे साथ देश के सारे दुखों का भी हो अवसान ॥13॥

(फाल्गुनी पूर्णिमा संवत् 1973)

 

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