अन्तरिक्ष में- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

अन्तरिक्ष में- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

खबर हुई न हुई और
भभूत वर्ण के अछिद्र बादलों से छा गया पूरा यह आकाश।
धूप नहीं और न छाया
नहीं थी सान्धेय रंगों की माया
पर्ण के दोनों तरफ सम रहता अभंग उजाला।

गतिशान्त लगता अब बादल
तन्द्रिल और नीरव :
हवा में अचल पवन
एकल बिन्दु का कहीं बहना।

भूमि की धूलि और तृण, पात, मेरा उत्तरीय सब ही अकम्प
पलक विहीन जैसे आँख,
केवल फैलाकर निज पाँख
अन्तरिक्ष में रेखा खींचकर श्यामल तैरते रहते विहंग।

तरल
सरल
तैरते अचल विहंग

रूपान्तर : सत्यपाल यादव

 

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