अनामिका -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 16

अनामिका -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 16

मुक्ति

तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
पत्थर, की निकलो फिर,
गंगा-जल-धारा!
गृह-गृह की पार्वती!
पुनः सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर की बनो आरती!–
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!–
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा!

खुला आसमान

(गीत)

बहुत दिनों बाद खुला आसमान!
निकली है धूप, खुश हुआ जहान!

दिखी दिशाएँ, झलके पेड़,
चरने को चले ढोर–गाय-भैंस-भेड़,
खेलने लगे लड़के छेड़-छेड़–
लड़कियाँ घरों को कर भासमान!

लोग गाँव-गाँव को चले,
कोई बाजार, कोई बरगद के पेड़ के तले
जाँघिया-लँगोटा ले, सँभले,
तगड़े-तगड़े सीधे नौजवान!

पनघट में बड़ी भीड़ हो रही,
नहीं ख्याल आज कि भीगेगी चूनरी,
बातें करती हैं वे सब खड़ी,
चलते हैं नयनों के सधे बाण!

ठूँठ

ठूँठ यह है आज!
गई इसकी कला,
गया है सकल साज!
अब यह वसन्त से होता नहीं अधीर,
पल्लवित झुकता नहीं अब यह धनुष-सा,
कुसुम से काम के चलते नहीं हैं तीर,
छाँह में बैठते नहीं पथिक आह भर,
झरते नहीं यहाँ दो प्रणयियों के नयन-तीर,
केवल वृद्ध विहग एक बैठता कुछ कर याद।

कविता के प्रति

ऐ, कहो,
मौन मत रहो!
सेवक इतने कवि हैं–इतना उपचार–
लिये हुए हैं दैनिक सेवा का भार;
धूप, दीप, चन्दन, जल,
गन्ध-सुमन, दूर्वादल,
राग-भोग, पाठ-विमल मन्त्र,
पटु-करतल-गत मृदंग,
चपल नृत्य, विविध भंग,
वीणा-वादित सुरंग तन्त्र।
गूँज रहा मन्दर-मन्दिर का दृढ़ द्वार,
वहाँ सर्व-विषय-हीन दीन नमस्कार
दिया भू-पतित हो जिसने, क्या वह भी कवि?
सत्य कहो, सत्य कहो, वहु जीवन की छवि!
पहनाये ज्योतिर्मय, जलधि-जलद-भास
अथवा हिल्लोल-हरित-प्रकृति-परित वास,
मुक्ता के हार हृदय,
कर्ण कीर्ण हीरक-द्वय,
हाथ हस्ति-दन्त-वलय मणिमय,
चरण स्वर्ण-नूपुर कल,
जपालक्त श्रीपदतल,
आसन शत-श्वेतोत्पल-संचय।
धन्य धन्य कहते हैं जग-जन मन हार,
वहाँ एक दीन-हृदय ने दुर्वह भार–
’मेरे कुछ भी नहीं’–कह जो अर्पित किया,
कहो, विश्ववन्दिते, उसने भी कुछ दिया?
कितने वन-उपवन-उद्यान कुसुम-कलि-सजे
निरुपमिते, सगज-भार-चरण-चार से लजे;
गई चन्द्र-सूर्य-लोक,
ग्रह-ग्रह-पति गति अरोक,
नयनों के नवालोक से खिले
चित्रित बहु धवल धाम
अलका के-से विराम
सिहरे ज्यों चरण वाम जब मिले।
हुए कृती कविताग्रत राजकविसमूह,
किन्तु जहाँ पथ-बीहड़ कण्टक-गढ़-व्यूह,
कवि कुरूप, बुला रहा वन्यहार थाम,
कहो, वहाँ भी जाने को होते प्राण?

कितने वे भाव रसस्राव पुराने-नये
संसृति की सीमा के अपर पार जो गये,
गढ़ा इन्हीं से यह तन,
दिया इन्हीं से जीवन,
देखे हैं स्फुरित नयन इन्हीं से,
कवियों ने परम कान्ति
दी जग को चरम शान्ति,
की अपनी दूर भ्रान्ति इन्हीं से।
होगा इन भावों से हुआ तुम्हारा जीवन,
कमी नहीं रही कहीं कोई–कहते सब जन,
किन्तु वहीं जिसके आँसू निकले–हृदय हिला,–
कुछ न बना, कहो, कहो, उससे क्या भाव मिला?

अपराजिता

(गीत)

हारीं नहीं, देख, आँखें–
परी नागरी की;
नभ कर गंई पार पाखें
परी नागरी की।
तिल नीलिमा को रहे स्नेह से भर
जगकर नई ज्योति उतरी धरा पर,
रँग से भरी हैं, हरी हो उठीं हर
तरु की तरुण-तान शाखें;
परी नागरी की–
हारीं नहीं, देख, आँखें।

वसन्त की परी के प्रति

(गीत)

आओ, आओ फिर, मेरे बसन्त की परी–
छवि-विभावरी;
सिहरो, स्वर से भर भर, अम्बर की सुन्दरी-
छबि-विभावरी;

बहे फिर चपल ध्वनि-कलकल तरंग,
तरल मुक्त नव नव छल के प्रसंग,
पूरित-परिमल निर्मल सजल-अंग,
शीतल-मुख मेरे तट की निस्तल निझरी–
छबि-विभावरी;

निर्जन ज्योत्स्नाचुम्बित वन सघन,
सहज समीरण, कली निरावरण
आलिंगन दे उभार दे मन,
तिरे नृत्य करती मेरी छोटी सी तरी–
छबि-विभावरी;

आई है फिर मेरी ’बेला’ की वह बेला
’जुही की कली’ की प्रियतम से परिणय-हेला,
तुमसे मेरी निर्जन बातें–सुमिलन मेला,
कितने भावों से हर जब हो मन पर विहरी–
छबि-विभावरी;

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