अधूरा गीत-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

अधूरा गीत-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

मैं शुरु हुआ मिटने की सीमा-रेखा पर,
रोने में था आरम्भ किन्तु गीतों में मेरा अन्त हुआ ।
मैं एक पूर्णता के पथ का कच्चा निशान,
अपनी अपूर्णता में पूर्ण,
मैं एक अधूरी कथा
कला का मरण-गीत, रोने आया ।
मेरी मजबूरी तो देखो-
काली पीली आँधी चलती है गोल-गोल,
धूसर बादल नीचे उतरे
जिन में मुरझाये पलों की है धूल-भरी,
मिट गये अचानक अनजाने अपने अमोल,-
बुझ गये दीप पड़ कर पीले
जिन की लौ गरम रखी अब तक ।
है अन्त हुआ जाता मेरा
इन अन्तहीन इतिहासों में :
जाने कैसी दूरी पर से
मुझ पर लम्बी छाया पड़ती,
किस की आधी आवाज़-भरी
मेरे बोझीले गिरते हुए उतारों में ।
मैं अधिकारी ना-होने वाली बातों का
मैं अनजाना, मैं हूँ अपूर्ण ।

दूरी से, कितने देशों की इस दूरी से,
वह महाकाल के मन्दिर की चोटी दिखती
जिस पर छाया था एक साँझ
दूरी की श्यामलता लपेट कर मेघदूत;
वे सोने के सिंहासन की गाती परियां,
नव रत्नों का सपना सुन्दर
जो मिट कर एक बार फिर से
था मिटा सीकरी के उन झीलों से अनुरंजित महलों में,
ये सब मोती थे टूट गये ।
अब एक और तारा टूटा
लम्बी लकीर बन अलका से,
फिर समा गया
गंगा की गोरज लहरों में ।
जीवन का वह रंगीन चाँद
जिस के उजियाले बिना हुआ है जग निर्धन,
जो सुधा-भरा ही डूब गया
काली रेखायों के आगे
विष की मीठी निद्रा के अन्तिम सागर में ।
कमज़ोर सूत के ये डोरे
अनजानी दूरी तक ओझल होकर जाते,
नीती-सी लम्बी उँगली की
रेखा-छाया उलझी-उलझी-सी दिख जाती
ढीले लगते
पर बन्द नहीं होते खिंचने ।
सुन्दर चीज़ें ही मिटती हैं सब से पहले,
यह फूल, चाँदनी, रूप, प्यार,
आँसू के अनगिन ताजमहल,
रागों की ठहरी गूँज,
असम्भव सपनों की सुन्दर मिठास-
स्रष्टा तक मिटता कलाकार के मिटने से,
पर गीतों के इन पिरामिडों,
-इन धौलागिर, सुमेरुयों पर
मिट जाती स्वयं मृत्यु आ कर !

दिख रहीँ मुझे विन्ध्या की अमिट लकीर दूर
वे घने-घने चट्टान-भरे लम्बे जंगल,
नर्मदा, बेतवा, क्षिप्रा की अविलम्ब धार
जिन पर हेमन्त कुहासे-सी छायी रहती
युग से युग तक,
अनजाने इतिहासों की वह अविराम याद ।
वन की श्यामलता की मिठास
अनजानेपन के रंगों से ही रंजित् है,
ऐसी छाँहों में पले हुए
ये चट्टानों के फूल
नहीं गल पायेंगे, धुल पायेंगे
निर्बल वर्षों के बोझीले गीले हिम से ।
अब वे वसन्त
कितने सहस्र वर्षों की ममी बना आया
बेहिस, अवाक् ।
ये शिशिर सरीखी बादल-भरी हवा चलती,
रोमाँ की यादें टूट रहीं,
ये मुझे उड़ाती ले जाती वर्षों पीछे
जाड़ों की संध्या का वह अन्तिम प्रहर,
रात, सन्दली चाँदनी में गोरी-गोरी होती :
जब कालिदास की नगरी में
उन गीतों की छाया में मैं भी बैठा था
पहली, भी अन्तिम बार वहीं-
जग ने जिस को मिटने पर ही है पहचाना,
वह चित्र न मुझ पर से उतरा,
उस को ही पूरा करने में
मुझ को भी पूर्ण न होने का वरदान मिला;
मैं चलता जाऊँगा इतिहासों के ऊपर
यद्यपि पाषाण हुआ जाता ।

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