अद्वैत-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

अद्वैत-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

नित्य प्रति जब मैं जागता हूँ
अपनी साँसों में तुम्हारी उपस्थिति
को महसूस करता हूँ
मेरी अंतरात्मा में तुम्हारा वास है।
सूर्य की किरणों के साथ दिन का आरम्भ
स्वच्छ कर अपने तन और मन को
बारम्बार प्रणाम करता हूँ
हे कुशल निर्माता !
कैसी है यह उत्कृष्ट देह रचना ?
दैनिक जीवन के व्यस्त दिनों में
मैंने सुना है “कर्म ही पूजा है”
तुम्हे अर्पित करता हूँ प्रतिक्षण।
शाम के आगमन के साथ
पक्षियों का समूह नीड़ों की ओर
और रात का दबे पावन प्रवेश
यही तो दिनचर्या है मेरी
पर इन सभी पलों में
मैं तुमसे कभी अलग न रहा।
हर क्षण तुम्हें साथ पाया है
सभी चीजों में और सभी जगहों पर
तुम ही तो हो मुझमें
मैं तुमसे भिन्न नहीं।
तो फिर मिलने और बिछड़ने का कैसा मोह !
प्रश्न ही नहीं रह जाता
यही अवस्था तो अद्वैत है

तुम मुझमें रहते हो और मैं
तुममें खो चुका हूँ

 

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