अथ मदिरास्तवराज-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

अथ मदिरास्तवराज-कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

निन्दतो बहुभिलोकैमुखस्वासपरागमुखै: ।
बल:हीना क्रियाहीनो मूत्रकृतलुण्ठतेक्षितौ ।।
पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा यावल्लुंठतिभूतले ।
उत्थाय च पुन: पीत्वा नरोमुक्तिमवाप्नुयात् ।।

(भले ही कुछ लोग इसकी -मदिरा की- निन्दा
करते हों किन्तु बहुतों के मुख से निकलने
वाली सांस को यह सुवासित करने का कार्य
करती है । यह अलग बात है कि यह बल
और क्रिया से हीन कर मूत्र से सिंचित धरा
पर क्यों न धराशायी कर दे फिर भी मदिरा
का सेवनकर्ता पीता है , पीता है , बार-बार
पीता है और तब तक पीता है ,जब तक कि
धरती माता का चुम्बन न करने लगे । वह
फिर उठता है ,फिर पीता है और तब तक
पीता जाता है जब तक कि उसकी नर देह
को मुक्ति नहीं मिल जाती ।)

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