अच्छा-बुरा-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

अच्छा-बुरा-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

यह कि चुपचाप पिए जाएँ
प्यास पर प्यास जिए जाएँ
काम हर एक किए जाएँ
और फिर छिपाएँ
वह ज़ख़्म जो हरा है
यह परम्परा है ।

किन्तु इन्कार अगर कर दें
दर्द को बेबसी की स्वर दें
हाय से रिक्त शून्य भर दें
खोलकर धर दें
वह ज़ख़्म जो हरा है
तो बहुत बुरा है ।

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