अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

अच्छा था अगर ज़ख़्म न भरते कोई दिन और
इस कू-ए- मलामत में गुज़रते कोई दिन और

रातों को तेरी याद के ख़ुर्शीद उभरते
आँखों में सितारे-से उतरते कोई दिन और

हमने तुझे देखा तो किसी को भी न देखा
ऐ काश! तिरे बाद गुज़रते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज में हम ग़म-तलबों को
तुम और बिगड़ते तो सँवरते कोई दिन और

गो तर्के-तआल्लुक़ था मगर जाँ प’ बनी थी
मरते जो तुझे याद न करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से ‘फ़राज़’ आए ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

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